16 July, 2010

जो पढ़े लिखे हैं वे भी इसके उपयोग से वाकिफ नहीं है,

सूचना का अधिकार अर्थात जान्ने का हक़ या कहें प्रजातान्त्रिक व्यस्था में आम आदमी की ताकत. यह वह व्यवस्था  है जो ईमानदार शासकीय कर्मचारी की प्रतिष्ठा बढाती है तो बेईमान की बेईमानी को लगाम लगाती है, इस क़ानून के लागू होने के बाद रिश्वतखोर सरकारी कर्मचारियों का चिंतित होना लाजमी है क्योंकि अब उन्हें भय है के राज खुल जाएगा. सूचना का अधिकार आम नागरिक के हाथों में सरकार द्वारा ही सौपा गया एक ऐसा अधिकार है जो उसे स्वंत्र भारत में आत्मसम्मान प्रदान करता है, कल तक जो लोक प्राधिकारी आम आदमी को कह देते थे आप पूछने वाले  कौन ? तो आज आम नागरिक के पास उत्तर  है - स्वतंत्र  व लोकतान्त्रिक गणराज्य भारत का नागरिक . जी हा, सूचना का अधिकार क़ानून के लगो होने  के पहले व बाद में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देने लगा है. कानून तो लागो हो गया किन्तु अधिकांश जनता इसे व इसकी ताकत को नहीं जानती है, निश्चित ही वे  कम पढ़े लिखे लोग है किन्तु जो पढ़े लिखे हैं वे भी इसके उपयोग से वाकिफ नहीं है, अनेक बार इस कानून के प्रयोगकर्ता पूर्वाग्रह से पीड़ित हो जाते है, सूचना हेतु आवेदन में जानकारियों की झाड़ी लगा देता है, जैसे सब कुछ एक ही बार में जान लेगे, अनेक आवेदनों में सूचना अधिकारी को समझ ही नहीं आता  की आवेदक क्या जानना चाहता है,
अनेक बार सूचना आवेदनों में प्रश्नों की श्रंखला होती है जैसे कोई संसद सदन  में प्रश्न  पूछ रहा हो. वास्तव में यह कानून शासन प्रशासन में पारदर्शिता के लिए बना है, नागरिक को यह अधिकार है वह जाने किन्तु सूचना का अधिकार कानून सिर्फ जानने का अधिकार देता है जो दर्ज है जो अस्तित्व में है, कोई भी लोक प्राधिकारी जानकारियों का आवेदक की प्रश्नावली के हिसाब से विश्लेसन करने देने हेतु बाध्य नहीं है, उपलब्ध जानकारी के आधार पर विश्लेषण उपलब्ध सूचना सामग्री से स्वयं सूचना आवेदक को ही करना होता है, ऐसे में सूचना आवेदक उपलब्ध समस्त जानकारियों का निर्धारित शुल्क जमा कराकर अवलोकन कर सकता है और अवलोकन पश्चात् वंचित दस्तावेजों के प्रतिलिप मांग सकता है, इन परिस्थितियों में लोक सूचना अधिकारी को भी चाहिए के वह आवेकड़ को दतावेज अवलोकन की सलाह दे.
 अनेक बार लोक सूचना अधिकारी ऐसे आवेदनों को विभिन्न उलटे सीधे नियमो का उल्लेख कर निरस्त कर देता है जो बाद में अपील व विभिन्न जिरह का कारण बनते है इससे न केव्बल उच्चाधिकारी प्रथम अपील अधिकारी व सूचना आयोग का कार्य दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है, आज अपेक्षा है के सूचना का अधिकार के प्रयोगकर्त भी इस कानून की भावना को सम्हे व लोक प्रध्करी भी धीरे धीरे ऐसी व्यस्था की ओर बढे की अधिकाधिक जानकारिय सीधे वेवसाईट पर प्रदर्शित हो तो निश्चित ही सूचना का अधिकार कानून अपने उद्देश्य में सफल होगा.