05 August, 2010

काश हम भी दलित होते तो ऐसा न होता

अखिलेश उपाध्याय कटनी. हरिजन होना आज गर्व की बात है. हरिजनों के लिए विशेष कानून बने है जिनका हमेसा  से सवर्णों को परेशान  करने और नीचा दिखने  के लिए उपयोग किया जाता है. हरिजन थाने में जिस पुलिस वाले की तैनाती हो जाती है वह अपने आप को धन्य मानता है. क्योकि शिकायत में डरा सहमा ब्राहमण, ठाकुर, बनिया होता है जो अपनी इज्जत बचाने  के लिए डरता-डरता थाने पहुचता है और सवर्ण के भय को हरिजन थाने में बैठे यमदूत अच्छी तरह से समझते है और जमकर ब्लेकमेल करते है.

हमारे परिवार में पिछले हफ्ते भी इसी तरह की घटना घटी जब सरकारी सेवा में लगी हमारे घर की महिला के साथ दलित स्वीपर इसी प्रकार हरिजन एक्ट का दुरूपयोग कर रही है. झूठी शिकायत करने की इस स्वीपर महिला की पुरानी आदत है. दो साल पहले भी इसी स्वीपर ने ब्रह्मण  होने की सजा दिलाई थी और हरिजन थाने में शिकायत की थी तब भी पुलिस ने ले देकर मामले को निपटाया था और उस दलित महिला को फिर से सेवा में मजबूरन रखना पड़ा था.

हरिजन होने का मतलब आज शान की बात है क्योकि आप उनसे ऊची आवाज में बात तक नहीं कर सकते. नहीं तो हरिजन एक्ट की तलवार आप के सर पर लटकती रहती है. कटनी हरिजन थाने में पदस्थ शर्मा और उईके जमकर पैसे की उगाही कर रहे है. हरिजन थाने पहुचने का मतलब आप पर पुलिसिया अंदाज से डरा धमकाकर आपकी इज्जत और पैसे की क्षमता देखकर मामले को निपटने के लिए पैसे की मांग की जाती है.

अधिकतर शिकायते हरिजन थानों में बिलकुल झूठी होती है. इसे थाने में बैठे अखिकारी बखूबी जानते है. पिछले दिनों महिला एवं बाल  विकास विभाग में एक हरिजन महिला ने परियोजन अधिकारी के खिलाफ शिकायत  कर दी थी बेचारी सीधी - सादी  महिला अनावश्यक परेशान  होती रही. उस हरिजन महिला के परिवार की किसी महिला का आगंवादी  कार्यकर्त्ता या सहायिका में नियुक्ति देने के बाद  के बाद ही मामला शांत हुआ.

हरिजन एक्ट का दुरूपयोग करने वालो के खिलाफ भी तो कोई क़ानून बनना चाहिए. कटनी में तो हरिजन थाने में बैठे अधिकारी शिकायत के लिए आये शिकायत करता को सवर्णों की रिपोर्ट को कैसे बढ़ा चदा कर लिखाया जाए ताकि उन्हें अच्छा पैसा मिले इसकी तरकीब भी बताते है.

आज उस ब्राह्मण  परिवार को अपने ब्राह्मण  होने पर शर्म है क्योकि यदि वह भी दलित होते तो इस तरह के बार-बार हरिजन एक्ट लगवाकर नाजायज नकारे लोगो को नौकरी पर से कब का हटा देते और समाज में होने वाली अनावश्यक बदनामी से बचते तथा जो एक बार की शिकायत में हरिजन थाने में चाडोत्री देनी पड़ती है उससे भी बचते.

धर्म निरपेक्षता की बात करने वाली भारत की सरकार, जाती-पाती  को मिटाने  वाली सरकार फिर क्यों समाज को जनरल, ओ बी सी, एस टी, एस सी में विभाजित कर रही है. वैदिक परंपरा ने समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों में समाज को बाट रखा था लेकिन आजाद भारत में जाती-पाती  व्यस्था का विरोध करने वालो ने इसे ख़तम करके उपरोक्त नई सरकारी जातिया  बना दी.

क्या आजाद भारत में सवर्ण होना गुनाह है ? इसका कोई जबाब देगा ?