19 August, 2010

आखिर आदिवासी कब तक ठगा जायेगा ?

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
वर्ष २००५-०६ में नेसनल फेमली हेल्थ सर्वे (एन ऍफ़ एह एस  ) के आकड़ो के मुताबिक पांच साल से कम उम्र के  ५४.३ प्रतिशत आदिवासी बच्चे कम वजन के पाए गए. आदिवासी मूल की ४६.६ प्रतिशत महिलाए बी एम् आई अर्थात बाडी मॉस इंडेक्स से तथा १८.५ प्रतिशत क्रोनिक इनर्जी डिफिसिएंसी से प्रभावित पायी गयी.

जबकि भारत सरकार आदिवासी बच्चो और महिलाओं के लिए ढेर सारी योजनाए चला रही है जो परोक्ष और अपरोक्ष रूप से उनके नुट्रीसन के लिए ही है. इनमे से एक है रीप्रोडक्टिव   एंड चाईल्ड हेल्थ प्रोग्राम जो की राष्ट्रिय ग्रामीण स्वास्थ्य मिसन के तहत स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के द्वारा चलाया ज रह है जिसका  एक उपक्रम है जननी सुरक्षा योजना (वाई जे एस )  जो की संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करने के लिए है.

केंद्र सरकार की इस योजना को राज्य सरकार के तंत्र के माध्यम से संचालित करना है. सारी गड़बड़ी यही पर हो रही है. हितग्रहियो को इसका लाभ उस स्तर पर नहीं मिल पा रहा है जितना शासन सोचता है. घर पर हुए प्रसव को स्वास्थ्य केंद्र पर दर्शाकर बी एम् ओ, बाबू और कार्यकर्त्ता डकार रहे है. एक चेक पर सौ-दो सौ लेना हक़ हो गया है.

गायत्री तिवारी

जननी सुरक्षा वाहन न मिलने के कारण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रीठी जिला कटनी के अंतर्गत आदिवासी बाहुल्य चिरोहला, ग्राम पंचायत बसुधा  में एक हफ्ते में दो बच्चो की मौत हो गई.  

दिनांक  १०.०८.२०१० को गायत्री तिवारी को एक स्वस्थ बच्चा घर पर ही हुआ और बच्चे ने  देख रेख के आभाव में १४.०८.२०१० को दम तोड़ दिया

इसी प्रकार दिनांक १६.०८.२०१० को रश्मि सिंह पति प्रमोद सिंह को डेलिवेरी के दौरान घर पर ही लापरवाही के कारण मृत बच्ची ने जन्म लिया .

रश्मी  सिंह

व्यवस्था में गड़बड़ी
जननी सुरक्षा योजना में दलाली और कमीशनबाजी के कारण लोगो को इसका लाभ नहीं मिल पा रह है. राजनैतिक पहुच और विभाग के लोगो ने ही अपने जननी वाहन वहां लगा रहे है इसलिए उनको तो मासिक एक मुस्त पैसा मिल जाता है फिर उन्हें दूर दराज जाने की भला क्या आवश्यकता ?

सुदूर जंगलो में बसे इन आदिवासिओ की मजबूरी बन जाती है  की वे घर पर ही प्रसव कराये क्योकि जब उन्हें वाहन की जरूरत होती है तब उन्हें वक्त पर वाहन कभी भी नहीं मिलता . इस बारे में चिरोहला  की आगन वाडी  कार्यकर्त्ता गायत्री दुबे ने बताया की अब तो जिले के टोल फ्री नंबर पर फोन लगाने पर गाड़ी पहुचाई जाती है और इस टोल फ्री नंबर को जब भी लगाते है तो इसे कोई भी नही उठता.
विगत पंद्रह दिनों पूर्व फोन न लगने  के चलते सुनीता पति महेंद्र सिंह की डिलिवेरी मजबूरन घर पर कम संसाधनों पर जोखिम उठाकर की गई.

एसा यहाँ आये दिन होता है. आखिर आदिवासी, ग्रामीण कब तक ठगा जायेगा ?