25 August, 2010

भाई की दी हुई रोशनी से बहन ने बांधी राखी

बचपन में ही आँखों की रोशनी खो देने वाली बहन के लिए एक भाई ने बहन की खोई हुई रोशनी वापस दिलाई और रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई  की दी हुई अखो की रोशनी की वजह से बहन ने भी की कलाई पर राखी बांधी तब बहन की आखों में खुसी के आंसू छलक पड़े थे. जबकि भाई को बहन की आखों की रोशनी वापस लाने  के लिए तीन वर्ष का समय लगा था.

गुजरात के सूरत जिले में कपोद्रा स्थित स्पिन्निग मिल के पास रहने वाले चालीस वर्शीव दिलीप मनसुखभाई पटेल (परवर्तित नाम) की कोई बहन न होने के कारण वर्तमान में अहमदाबाद में रहने वाली अठारह वर्शीव धर्म की बहन खुशबु को अपनी सगी बहन जैसा मानता है. सात वर्ष पहले खुशबु जब सूरत में रहती थी तब उसकी दोनों आखो में किसी कारणवश एसिड  चला गया था. जिसके कारण वह अपनी दोनों आँखों की रोशनी गुमा चुकी थी. अपनी इस बहन की दोनों आखो की रोशनी जाने के बाद दिलीप तो जैसे पागल सा हो गया था. बहन की रोशनी वापस लाने के लिए उसने बड़े-बड़े डाक्टरों को दिखाया अंत में उसका संपर्क लोकद्रष्टि चक्षु बैंक  के डाक्टर प्रफुल्ल शिरोया से हुआ.

आँख में एसिड पड़ने से दोनों आँख गुमाने वाली बहन की रोशनी वापस लाने के लिए भाई को तीन वर्ष लगे
दिलीपभाई ने अपने मन में निश्चय किया की जो बहन मेरी कलाई में राखी बाधती  है उसकी आखो की रोशनी के लिए वह कुछ भी करेगा. लगातार तीन वर्ष के प्रयासों के बाद उसकी बहन की आखो की रोशनी वापिस मिल गयी है. इस बात से प्रफुल्लित हो चुके दिलीपभाई ने अब चक्षुदान के प्रति लोगो में जाग्रति लाने के पयसो में अब वह सक्रियता से जुट गया है.

डाक्टर दिव्येश शिरोया  ने कहा की भारत में प्रति वर्ष तीस हजार से भी ज्यादा लोगो को आख की गोलक में बीमरिओ के कारण अंधे हो जाते है. आधुनिक युग में नेत्र गोलक का प्रत्यर्पण करके बदला जा  सकता है. म्रत्यु के बाद चक्षुदान किया जाए तो अंधत्व को दूर किया जा सकता है. जबकि म्रत्यु  के बाद चक्षुदान के प्रमाण बहुत कम है. क्योकि हमारे समाज में ऎसी अंधश्रद्धा है की म्रत्यु  के बाद चक्षु दान करने से नए जन्म में आँख नहीं मिलती. चक्षुदान के लिए जाग्रति के लिए दिनांक 25 अगस्त से दिनांक 08 सितम्बर तक चक्षुदान जाग्रति पखवाडा मनाया जाता है.
गुजरात समाचार से साभार