22 August, 2010

सरकारी योजना बना रही चोर

देश के शिक्षा व्यस्था का क्या हाल है सभी हो पता है. सरकारी विद्यालयों में जबसे कोटे के शिक्षक भर्ती किये जाने लगे है तभी से शिक्षा का स्तर निरंतर गिरता गया और आज शासकीय विद्यालयों  की  शिक्षा व्यस्था बिलकुल चरमरा गयी है. एक तो सरकारी विद्यालयों का हाल पहले से ही बेहाल था उस पर से मध्यान भोजन ने इसे और भी चोपट कर दिया है.
सरकारी योजना इस तंत्र में बैठे छोटे से बड़े कर्मचारी को चोर बनाने के गुर सिखाती है, कैसे.......दरअसल आजकल स्कूलों में केंद्र सरकार ने जो दोपहर का भोजन का कार्यक्रम चला रखा है, इसने पूरे शिक्षा तंत्र को चोर बना दिया है. सरकारी स्कूलों में एक तो पहले से ही पढाई नही हो रही थी उस पर अब बच्चो को खाना खिलाने के पचड़े में पढ़ने के काम ख़राब हो रहा है. और यह खाना कोई पैकेट फ़ूड तो है नहीं की बच्चो को दे दिया और हो गया. इसके लिए विधिवत मोनिटरिंग टीम बनाई गयी है जिनमे डी पी सी, बी आर सी, बी ए सी, जन शिक्षा केंद्र प्रभारी, जनशिक्षक आदि. इतनी लम्बी चौड़ी मोनिटरिंग टीम होने के बाद भी भोजन में गड़बड़िया........ क्यों ?


इस जाच दल को कोई फिक्र ही नहीं होती की आज खाना बनाने वाला आया की नहीं, रसोईया कही खाने के सामान में से चोरी तो नहीं कर रहा. अगर खाना सही न आका हो तो उसकी भी शिकायत की जावे. आये दिन खाने में कीड़ा या कंकर पत्थर निकलन तो आम बात हो गई है.

शिक्षा विभाग के कर्मचारी इससे अपना पल्ला झाड   लेता है उनका कहना होता है की जबसे भोजन स्वसहायता समूहों को दिया गया है और इसकी बाग़ डोर    सी ई ओ और ए डी  ओ के हाथो में गई है तब से भोजन की गुडवत्ता    में बहुत ज्यादा गिरावट आई है. स्व सहायता समूह के अध्यक्ष और सचिव लाख कहने पर भी सुनते ही नहीं.....और आखिक  से अधिक पैसा बचाने की जुगत में लगे रहते  है. अब अगर इनकी शिकायत जनपद सी ई ओ से की जाती है तो इनके कानो पर जू तक नहीं रेगती. और शिक्षा विभाग के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह से पल्ला झाड़ ले रहे है और  यह  स्व सहायता समूह भी राजनैतिक सरक्षण प्राप्त बाहुबलियो के जो ठहरे... तो कही जाच करता को लेने के देने न पड़ जाए सो कोई नहीं बोलता.

स्व सहायता समूह बेफिक्र होकर काम कर रहे है. इनका सीधा कहना है की योजना से सम्बंधित अधिकारी से हमारा महीना बंधा है.....ऐसे में भला इन समूहों का कोई क्या बिगड़ लेगा ? सम्बंधित अधिकारी कर्मचारियो को तो  सिर्फ अपनी जेब गरम होने से मतलब है. स्वसहायता समूह वाले सही कह रहे है की भैया अगर बाबू को पैसा देगे तो भला फिर भोजन कैसे अच्छा खिला पाएगे ? समूह के पैसे से तो नहीं न.... तो इसके लिए अंनाज की चोरी करते है......करनी तो पड़ेगी, तभी तो भारत के भविष्य का पेट कटा जा सकेगा. या फिर ये समूह संचालक सरकार से कहे की अपना कार्यक्रम बंद करो, इसमें बहुत झंझट है, लेकिन इससे तो बच्चो का नुक्सान होगा, सरकार ने इन बच्चो को इस व्यस्था में भिखारी जो बना दिया है. कही पर भी पूरे बर्तनों में भोजन नहीं दिया जाता, एक साथ बिठाकर भोजन नही दिया जाता.... अनियमितताओं की तो लम्बी फेहरिश्त है. खैर .... 

तो क्या इस घूसखोरी के खिलाफ कुछ हो सकेगा ? पढाई तो सत्यानास थी ही अब भोजन भी ठीक ढंग से नहीं दे पा  रही सरकार.  इस समस्या का हल क्या है ?
अगर आपके पास इसका कोई हल हो तो अवश्य बताईए.