11 September, 2010

क्या मै भी प्रसव के दौरान म़र जाऊगी .......?

अखिलेश उपाध्याय   / कटनी
जब शाशिबाई ने तीसरे स्वस्थ बच्चे को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रीठी में दिनांक 05 .09 .2010 को जन्म दिया तो परिवार के सदस्य खुश थे.

प्रसव सामान्य हुआ. दो दिनों बाद अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई. लेकिन तीन दिनों  के बाद शाशिबाई आदिवासी को हल्का बुखार आया जो सामान्य दवा देने के बाद उतर गया. पति राघवेन्द्र ने अगले दिन शशि के सीने में दर्द होने पर एवं तेज बुखार होने की दशा में उसे शुक्रवार की शाम को अपने ग्राम हरद्वारा से रीठी जो चार किलोमीटर दूर है अस्पताल पहुचाया गया.

अस्पताल पहुचने पर मरीज के परिजनों को शाम 06 .30 पर एक नर्स के आलावा कोई भी नही मिला. ड्यूटी पर तैनात डाक्टर गुलाब तिवारी अपने बंगले पर थे. उन्होंने वही मरीज को बुलाया और परिक्षण के बाद रक्त परिक्षण हेतु लिखा एवं पर्चे पर कुछ दवाये भी लिखी.

तीन घंटे बाद ब्लड रिपोर्ट दी गई. तब तक मरीज की हालत और भी बिगड़ गई थी. बी एम् ओ डाक्टर गुलाब तिवारी अपने घर से अस्पताल नहीं पहुचे. रात दस बजे इस आदिवासी महिला ने इलाज के आभाव तथा चिकित्सक की लापरवाही के कारण देह त्याग दी.

परिजनों ने डाक्टर के द्वारा इस लेट-लतीफी का जब करण पूछा तो डाक्टर गुलाब तिवारी ने बड़े अभद्र तरीके से परिजनों को डपटते हुए कहा की जो कुछ पूछना हो वह लिखकर दो तब मै कुछ जबाब दूंगा.

मध्यप्रदेश मातृत्व म्रत्यु दर में देश के राज्यों की तुलना में शिखर पर है विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रो में अभी भी जहा स्वास्थ्य सेवाए न के बराबर है और लोग अभी भी जागरूक नहीं है.

यूनिसेफ के अनुसार, मध्य प्रदेश, असाम  और उत्तरप्रदेश के साथ देश में मातृत्व म्रत्यु दर में सबसे आगे है जहा प्रति एक हजार पर सात  सौ मौत प्रसव के दौरान हो रही है. जबकि मातृत्व म्रत्यु  दर का राष्ट्रिय आकड़ा ४०७ है (सभी आकडे २००१ के जनगड़ना   के अनुसार)
यह भारत के अधिकांस ग्रामीण इलाको की कहानी है. शहरी क्षेत्रो में निजी चिकित्सालयों में अच्छी सुविधाओ के कारण यहाँ की महिलाओ को प्रसव के दौरान कोई तकलीफ नहीं होती लेकिन ग्रामीण महिलो को प्रसव के दौरान और उसके बाद भी मूलभूत सुविधाओ के लिए संघर्ष  करना पड़ता है.

प्रसव पश्चात् स्वास्थ्य विभाग द्वारा दी जाने वाली दवाये एवं उपचार की सारी प्रक्रिया मात्र सरकारी रिकार्ड को दुरुस्त करने के लिए कागजो में ही चल रही है. ऐसा नहीं है की स्वास्थ्य विभाग यह सब फंड की कमी के चलते कर रहा हो उनके पास प्रसव पूर्व और पश्चात इलाज के लिए पर्याप्त फंड और दवईया उपलब्द्ध है लेकिन उनके जमीनी कार्यकर्त्ता और स्वयं बी एम् ओ का लापरवाही पूर्ण रवैया इन मातृत्व म्रत्यु का कारण है.

शाशिबाई आदिवासी के पति राघवेन्द्र का कहना है की ऐसे में अस्पतालों का क्या उपयोग जो जीवन नहीं बचा सकता ? रीठी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बमुश्किल कोई डाक्टर ड्यूटी पर मिलता है. प्रसव के पश्चात जच्चा और बच्चा को अस्पताल प्रशासन जल्दी  डिस्चार्ज  क्यों कर देता है ? अब तो लोगो का कहना है की इससे अच्छा तो हम घर पर ही सुरक्षित प्रसव करा लेते थे.

ऐसे में अब जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत प्रसव के लिए जाने से महिलाये डरने लगेगी और उनका यही प्रश्न होगा क्या मै भी प्रसव के दौरान म़र जाऊगी .......?