31 October, 2010

लाभ से वंचित पात्र हितग्राही

कई गरीबो का नहीं है सूची में कमी
अखिलेश उपाध्याय / कटनी
सरकार द्वारा बीपीएल कार्ड धारियों को दिया जा रहा सस्ता राशन, तमाम आर्थिक रियायतों को देखकर अच्छी खासी सम्पत्ति के मालिक सरकारी गरीब बनाने  के लिए लालायित हो रहे है और जोड़-तोड़ कर किसी तरह गरीबी रेखा की सर्वे सूची में शामिल भी हो गए है. जो वास्तविक रूप से गरीब है वह इन योजनाओं के लाभों से बंचित बने हुए है. आर्थिक रूप से सक्षम लोग फर्जी रूप से गरीब बनकर सरकार की योजनाओं का जमकर लाभ उठा रहे है.
इस स्थिति में सरकार द्वारा गरीबो के उत्थान के लिए  चलाई जा रही योजनाओं के उद्देश्य की पूर्ती नहीं हो पा रही है और सरकारी राशी का अपव्यय भी हो रहा है.
विकासखंड की ग्राम पंचायतो में कुछ ऐसे गरीब परिवार है जिनकी आर्थिक स्थिति बदतर है. यह परिवार मजदूरी कर दो जून की रोटी जुटा पाते है लेकिन उसके बावजूद शासन के जिम्मेदार अधिकारियो की नजरो  में यह  परिवार गरीबो की श्रेणी में आज तक नहीं आ पाए है. जबकि ठीक इसके विपरीत ग्राम में कृषि भूमि. पक्के मकान के स्वामी ग्रामीण गरीबी रेखा की सर्वे सूची में शामिल होकर बीपीएल कार्ड धारी बन गए है और बीपीएल धारियों को मिलने वाली तमाम रियायतों का जमकर लाभ उठा रहे है. अंधेर  नगरी चौपट राजा की तर्ज पर फर्जी गरीब बनकर शासन की योजनाओं का लाभ लेने का फर्जीवाड़ा केवल रीठी जनपद की पंचायतो में ही नहीं बल्कि जिले की लगभग हर पंचायत में हो रहा है और तो और नगरीय क्षेत्र में भी फर्जी गरीबो की संख्या हजारो में है.

कटौती ने बदली दिनचर्या

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
दीपावली का त्यौहार नजदीक आने के बावजूद विद्युत् कटौती  में कोई रियायत नहीं दी जा रही है. बिजली कटौती ने आम आदमी की दिनचर्या को बिलकुल बदल दिया है. गृहणियो   के चौके चूल्हे, बच्चो के शौक और वयस्कों के काम करने का तरीका बिलकुल बदल गया है. वही शहर में चोरियों की घटनाएं भी काफी बढ़ गई है. इस तरह लोगो को दिन में कामकाज और रात्रि में घर की रखवाली पर ध्यान देना पड़ रहा है.
विद्युत् वितरण कंपनी ने क्षेत्र में बिजली कटौती का जो समय निर्धारित किया है उसका शहरी जन जीवन पर व्यापक  असर पड़ा है. वर्तमान  में विद्युत् विभाग द्वारा तहसील क्षेत्रो में सुबह तीन से छेह, दोपहर बारह से शाम छेह तक और रात्रि नो से बारह बजे तक घोषित कटौती की जाती है. इसके अलावा अघोषित विद्युत् कटौती किसी भी समय कर ली जाती है, जिसे लोगो में कुछ समय तक तो आक्रोश का माहौल बना रहा लेकिन जनप्रतिनिधियों द्वारा अनसुनी किये जाने और राजनैतिक दलों के मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते हुए जनता की सुनवाई न होने से अब धीरे-धीरे लोगो ने अपने आप को कटौती के अनुसार ढालना आरम्भ कर दिया है. वर्तमान में विद्युत् कटौती के समबन्ध में लोगो से चर्चा करने पर कुछ इस प्रकार तस्वीर उभरी-
बहुत साल से बिजली के प्रकाश में रहते-रहते हम उसके आदि हो गए है अब बिजली कटौती के समय विद्युत् विभाग को ताने देने से अच्छा है पार्क में सैर करने निकल जाते है. घर के काम में परेशानी तो है पर क्या करे सब कुछ बिजली विभाग  पर निर्भर है
- निर्मला पण्डे, समाज सेविका
शाम की कटौती से पहले मेरे पति को घर आकर बच्चो को घुमाने ले जाना पड़ता है. जिससे बच्चे खुश रह सके. घोषित कटौती के कारण उजियारे में घर का खाना भी जल्दी तैयार करना पड़ता है. हमें खुद को बिजली कटौती के अनुसार ढालना शुरू कर दिया है, क्योकि हमें मालूम है की बिजली विभाग को कोसने से कुछ नहीं होने वाला अपनी पुरानी दिनचर्या को ही बदलना होगा
 - मनोरमा सिंह, शिक्षिका
परिवार में अब बिजली कटौती ने बच्चो के शौक बदल दिए है पहले घर के बच्चे टीवी के सामने बैठे कार्टून चैनल देखा करते थे लेकिन अब मोहल्ले के बच्चो के साथ खेलने में समय बिताते है. इन बच्चो ने खुद को बिजली कटौती  भुलाने का बहाना  ढूढ़ लिया है. लेकिन यह स्थाई नहीं है. - श्रीमती अंजना डेविड केमोर
हमारे घर पर तो इनवर्टर है इसीलिए घर में ज्यादा परेशानी नहीं आती लेकिन हास्पिटल में मरीजो को जरूर परेशानी होती है जब  प्रदेश शासन बिजली देने असमर्थ है तो हम क्या कर सकते है इसलिए समय के अनुसार खुद को ढाल लिया है.
- डाक्टर श्रीमती राकेश रंजन , कटनी
विद्युत् विभाग द्वारा बिजली की कटौती के चलते दिनचर्या बिलकुल बदल गई है. घर गृहस्थी  का काम प्रभावित हुआ है. शाम के वक्त जब लाईट नहीं रहती तो बच्चो का मन बहलाने के लिए बच्चो के साथ खेलना पड़ता है तथा दिन में अपने काम निपटा लेती हूँ
-  श्रीमती दिव्या पटेल, बहोरिबंद

मिलावट का खेल अधिकारी फेल

अखिलेश उपाध्याय / कटनी दीपावली आते ही मिलावटखोर एक बार फिर सक्रिय हो गए है  लेकिन इस बार शहर में नकली माल तैयार करने की जगह कटनी के आसपास  बसे गावो में नकली मावा और घी  तैयार किया जा रहा है. माल तैयार होने के बाद यहाँ से कई जिलो  में नकली माल की सप्लाई हो रही है. दिलचस्प बात यह है की खाद्य एवं सम्मिश्रण विभाग सब कुछ जानते हुए भी मिलावटखोरो पर कार्रवाई करने में कंजूसी बरत रहा है.

हर चीज मिलावटी
दाल - बटर की दाल
बेसन - पीला रंग
मावा - डालडा और एसेंस
घी -  डालडा, रिफाइंड  और एसेंस
शक्कर - सफ़ेद पावडर
लाल मिर्च -  लाल रंग
रिफाइंड  -  पाम आयल
दूध - vaiitanar, सपरेटा, शेम्पू
मिनरल वाटर -  अशुद्ध पानी
हल्दी - पीला रंग

खाद्य विभाग करता है फर्ज अदायगी
खाद्य एवं औषधीय सम्मिश्रण विभाग में जब नए इंस्पेक्टरों की शहर में पोस्टिंग हुई थी, तो काफी कार्रवाई हुई  लेकिन इसके बाद जैसे-जैसे बाहर से आये अधिकारियो के शहर में संपर्क बढ़ते गए, कार्रवाई औपचारिकता बनकर रह गई. आलम  यह है की आधी जगह जो कार्रवाई की जाती है वह तो कागजो में दिखाई जाती है जबकि अधिकांस जगह तो मामला बिना दर्ज हुए ही निपटा दिया जाता है.

भ्रष्टाचार और दलाल मुक्त करने कृत संकल्पित

अखिलेश उअप्ध्यय / कटनी
जनपद पंचायत रीठी अद्ध्यक्ष श्रीमती प्रीति सिंह ने अपने वाडे के अनुरूप जनपद में विकास को गति प्रदान करने में एक और कदम बढाया. ग्राम पंचायत घनिया में वर्षों से अवरुद्ध विकास कार्य को नवजीवन देने जनपद अद्ध्यक्ष प्रीति सिंह ने रंगमंच का भूमिपूजन किया.

इस अवसर पर जनता के विभिन्न मुद्दों को उन्होंने गंभीरता से सुना और अपने वाडे के अनुरूप भ्रस्टाचार और दलाल मुक्त जनपद के अपने वाडे को और तेजी से अमल में लेन का संकल्प दुहराया.
सरपंच राम्सखिबाई, सचिव पुष्पेन्द्र मिश्र एवं अन्य ग्रामीणों की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ.

30 October, 2010

बिना शिक्षक के लग रही शाला

बिना शिक्षक के लग रही शाला
कटनी /  जनपद पंचायत रीठी में स्थित शासकीय हाई स्कूल पटोहा में शनिवार को विद्यार्थी तो मौजूद थे लेकिन स्कूल में अधिकांस शिक्षक और शिक्षिका अनुपस्थित थे. ऐसे में बिना शिक्षक - शिक्षिकाओं के स्कूल संचालित हो रहा था. इस लापरवाही का खुलासा जनपद पंचायत रीठी की अध्यक्ष प्रीति सिंग द्वारा शाला के आकस्मिक निरिक्षण के दौरान हुआ.
जनपद अध्यक्ष रीठी ने शिक्षिको की इस लापरवाही से जिला शिक्षा अधिकारी को अवगत करा दिया है. उन्होंने बताया की शनिवार को शासकीय हाई स्कूल पटोहा का आकस्मिक निरिक्षण किया तो उस दौरान एस के तिवारी उपस्थिति पंजी में लाल पेन से आन ड्यूटी लिख गए थे.
इसी तरह मधुलिका दुबे प्रयोगशाला सहायक दिनांक 28 .10 से अनुपस्थित है वही शाला में उपस्थित शिक्षको ने बताया की मधुलिका दुबे की दी गई पढाई की जिम्मेवारी से वे कतराती है और उन्होंने पढ़ाने से स्पष्ट मना कर दिया है.
इस सम्बन्ध में जब विद्यार्थियों  से जानकारी ली तो विद्यार्थियों ने बताया की प्रतिदिन सुबह 11 .30 बजे के बाद ही शिक्षक एवं शिक्षिका शाला में पहुचते है और दोपहर चार बजे के पूर्व ही शाला से चले जाते है.
ग्रामीणों ने जनपद अध्यक्ष प्रीति सिंह को बताया की हाई स्कूल पटोहा में पदस्थ शिक्षको द्वारा नियमित रूप से शाला में उपस्थित नहीं होने और निर्धारित समय पर शाला में नहीं पहुचने से विद्यार्थियों के अध्ययन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है.

अब नहीं भेजते ग्रीटिंग

कटनी /
त्योहारों के आगमन होते ही अपने प्रियजनों को भेजे जाने वाले शुभकामना सन्देश  यानि ग्रीटिं  कार्ड का चलन इन दिनों सूचना क्रांति के रूप में मोबाईल व कम्पुटर के बेतहाशा उपयोग की वजह से कम हो गया है. जिसकी वजह से गिफ्ट  सेंटरों में ग्रीटिंग कार्ड की मौजूदगी कम ही दिखाई दे रही है.
बदलते परिवेश व आधुनिकीकरण की वजह से सब कुछ हाईटेक होता जा रहा है. संचार की विभिन्न सुविधा होने  की वजह से अब ग्रीटिंग कार्डो के मध्यम  से शुभकामनाये देने वालो की कमी बढती  जा रही है. अन्यथा पूर्व में शुभ अवसरों पर प्रियजनों को शुभकामना सन्देश  देने के लिए एक से बढ़कर एक आकर्षक ग्रीटिंग कार्ड खरीदने के लिए लोगो की काफी भीड़ उमड़ती थी और दुकानदार भी ग्रीटिंग पर अच्छी  खासी कमाई  कर लेते थे किन्तु मोबाईल एवं कम्पुटर के बढ़ते चलन से ग्रीटिंग की चमक फीकी पड़ने लगी है, हालाकि दिवाली पर्व को देखते हुए शहर  की दुकानों में ग्रीटिंग कार्ड सज गए है किन्तु ग्राहकों की कमी दुकानदारो को खल रही है,
मोबाईल का चलन  इस कदर बढ़ चुका है की लोग मोबाईल के माध्यम से अपने प्रियजनों की हर गतिविधि से वाकिफ हो जाते है और वे अपने प्रियजनों को शुभकामनाये फोन  व एस एम् एस से दे देते है, जिसकी वजह से ग्रीटिंग का चलन अब कम होता जा रहा है.

सिक्को से बन रहे गहने


अखिलेश उपाध्याय / कटनी
रिजर्व बैंक द्वारा एक, दो और पांच रूपये के सिक्के पर्याप्त संख्या में जारी किये जाने के बाद भी अंचल में चिल्लर का संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है. दुकानदारो ने 25 -50 पैसे को तो चलन से बाहर ही कर दिया है. इससे बाजार में सिक्को की खनक कम हो गई है. वही खुल्ले पैसो के अभाव में लोगो को जहा अनचाही वस्तुए अथवा अतिरिक्त सामग्री खरीदना पड़ती है. दुकानदारो द्वारा ग्राहकों के ऊपर इस कीमत का अतिरिक्त सामान लेने का दबाव आने लगा है. इसी तरह फुटकर दुकानदारो ने खुल्ले पैसे की जगह टाफिया  देना आरम्भ कर दिया है. इसके साथ ही कतिपय दुकानदारो, व्यापारियों ने तो सरकार के सामानांतर अपनी निजी मुद्रा बतौर कूपन प्रचलित कर रखी है.  इसी तरह किराना दुकान, सब्जी विक्रेता, चाय और पान के ठेला आदि ने ग्राहकों को खरीददारी के बाद एक या दो रूपये लौटाने के एवज में माचिस, गुटखा, पाउच, टाफी इत्यादि विकल्प तैयार कर रखे है. कतिपय होटल संचालको  ने तो एक या दो रूपये के अपनी होटल के नाम के कूपन जारी कर रखे है. शहर में निजी मुद्रा का सरेआम चलन किया जा रहा है और प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है.

गहनों   में हो रहा उपयोग
सूत्रों के अनुसार कटनी अंचल में सराफा व्यवसाय से जुड़े एवं अन्य लोगो द्वारा सिक्को की कालाबाजारी का काम बड़े ही चालाकी पूर्वक किया जा रहा है. इनका उपयोग वह आभूषण बनाने में कर रहे है. जबकि अन्य प्रदेशो में 25 एवं 50 पैसे के सिक्के आज भी चलन में है. अर्थ व्यथा के नियम के अनुसार प्रत्येक 20 वर्ष में प्रचलित पुराने सिक्को  का मूल्य नए सिक्को से ज्यादा हो जाता है. सिक्के आभूषण और अन्य वस्तुओ के काम आने लगते है. इससे निपटने के लिए आर बी आई  की कोई तैयारी नहीं होती. पुराने सिक्को के बदले नए सिक्के बाजार में जल्दी नहीं लाये गए तो यह समस्या गंभीर रूप ले सकती है.
शहर में सब्जी विक्रेताओं का कहना है की उन्हें अपने धंधे में रेजगारी की मजबूरी के चलते 80 रूपये के बराबर ऐसे सिक्के के लिए 100 रूपये देने पड़ रहे है. वही बेकरी, दवाई व परचून की दुकानों पर ग्राहक कोई सामान खरीदता  है तो दुकानदार उसे 5 रूपये से कम लौटाने को तैयार नहीं होता. वे एक, दो, तीन, चार रूपये के बकाया को सिक्को या नोटों के बदले  चुकाने की बजाय  या तो कोई सामान दे देते है या फिर सामान देने से ही मना कर देते है वही 25 -50 पैसे के बदले में टाफी थमा दी जाती है. शराफा बाजारों के आलावा शहर के अन क्षेत्रो में भी पुराने सिक्को से धातु निकालकर गहने बनाने का काम धड़ल्ले  से जारी है.

100 के सिक्के 180 रूपये में
सराफा बाजार में एक रूपये के सौ सिक्के 165 से 180 रूपये तक में बिक रहे है. इन सिक्को को गलाकर सराफा व्यवसाय से जुड़े लोगो द्वारा पायजेबी, अगूठी और विछिया बनाये जा रहे है. इसका एक प्रमुख कारण यह है की इन सिक्को से निकलने वाला स्टील एवं निकिल उच्च  श्रेणी का होता है. वही इनसे बने आभूशनो की चमक चांदी  के समान ही रहती है. दूसरा प्रमुख कारण पिछले कुछ महीनो से दोनों कीमती धातुओ के भाव में आया जबरदस्त उछाल है. इस वजह से सोने-चाँदी के आभूषण गरीब और मध्यम वर्ग की पहुच से बाहर होते जा रहे है. ऐसे में बढती महगाई के इस ज़माने में यदि कोई चीज सस्ती मिलती है तो आम आदमी उसी ओर जल्दी आकर्षित होता है.

शासन प्रशासन नाकाम
सरकार के लिए छोटी कीमत वाली मुद्रा की व्यस्था काफी कठिन साबित हो रही है. एक  और दो रूपये के कागजी नोटों की छपाई तो सरकार ने लगभग बंद  कर रखी है. इसके दो कारण है एक तो कागजी मुद्रा की उम्र ज्यादा लम्बी नहीं होती, वही महगा कागज और छपाई की लागत अंकित मुद्रा से कई गुना ज्यादा होती है. इस कारण सरकार ने काफी पहले ही एक दो और पांच के नोटों की जगह सिक्को को बढ़ावा देने की नीति अपना ली थी. एक, दो रूपये के सिक्को की किल्लत की वजह इनमे प्रयुक्त धातु का महगा होना है यानि सिक्को को गलाने पर धातु को बेचकर उनके अंकित मूल्य से अधिक कीमत मिल जाती है. सरकारी मुद्रा को जलाना और गलाना  दोनों ही अपराध है पर सरकार इस गोरखधंधे को रोक पाने में अक्षम  है.

करोडो का व्यापार और टेक्स का भुगतान नहीं ......!

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
कटनी में करोडो का ड्राई  फ्रूट   का व्यापार होता है. वैध अवैध रूप से हो रहे इस व्यापार पर अभी तक वदिज्य  कर  विभाग की नजर नहीं पड़ रही है. ड्राई फ्रूट पर 6 फीसदी वैट लगता है जबकि इस अनुपात  में कभी भी टेक्स जमा नहीं होता है. इस वित्तीय वर्ष में किसी भी बड़े किराना व्यापारी के यहाँ कोई सर्चिंग भी नहीं हुई.

कटनी से न केवल ड्राई  फ्रूट बल्कि किराना आईटम का करोडो का व्यापार हो रहा है. जानकार सूत्रों की माने तो बगैर इंट्री टेक्स चुकाए हर रोज माल शहर में आ रहा है लेकिन इस पर कोई भी कार्रवाई नहीं होती. इससे सहज रूप से अंदाजा लगाया जा सकता है की शहर का किराना व्यापार किस तरह से हो रहा है.

दिवाली पर व्यापार चरम पर
ठण्ड और दिवाली के मौसम में ड्राई  फ्रूट  का सबसे अधिक व्यापार होता है. इसके अंतर्गत शहर के आलावा आस-पास के कई जिलो में भी यही से ड्राई  फ्रूट की सप्लाई होती है.. वाडिज्य कर विभाग ने अभी तक किसी भी किराना व्यापारी के यहाँ कोई कार्रवाई नहीं की है.

किस पर कितना वैट
वाडिज्य कर विभाग द्वारा ड्राई फ्रूट पर 5 फ़ीसदी वैट, 1 फीसदी इंट्री टेक्स लिया जाता है. इस प्रकार से लगभग 6 फीसदी टेक्स चुकाना पड़ता है.

माल दिल्ली से आता है
शहर में सबसे अधिक माल दिल्ली से ही आता है. मुख्य रूप से ड्राई फ्रूट की ज्यादा पैदावार जम्मू एवं खाड़ी  देशो में होती है. इन स्थानों से दिल्ली के व्यापारी माल मगवाते है और कटनी में सप्लाई करते है. दिल्ली की ओर से आने वाले ट्रक एवं रेलवे द्वारा प्रतिदिन माल शहर में लाया जाता है.

29 October, 2010

धुएं में उड़ रहा कानून

धुएं में उड़ रहा कानून
अखिलेश उपाध्याय  / कटनी
उच्चतम न्यायालय ने सार्वजानिक स्थानों पर धूम्रपान करने वालो पर भले ही पाबन्दी लगा दी पर हकीकत कुछ और बया कर रही है. शहर  का शायद ही ऐसा कोई सार्वजानिक स्थान हो जहा धूम्रपान न किया जाता हो. हाईकोर्ट का आदेश बेअसर होने का कारण धूम्रपान करने वालो के खिलाफ कोई कार्रवाई न होना है, पुलिस रिकार्ड के अनुसार अभी तक सिगरेट व बीडी पीने वाले लोगो के खिलाफ गिने-चुने ही मामले दर्ज किये गए है.

उल्लेखनीय है की जब सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजानिक स्थानों  पर धूम्रपान करने वालो को रोकने  के लिए सख्त नियम बनाकर जुर्माने की चेतावनी दी  तब से शायद किसी भी शासन प्रशासन के अधिकारी ने धूम्रपान करने वालो पर कोई कार्रवाई नहीं की है हालत यह है की सार्वजनिक स्थानों  तथा थाना परिशर में पुलिस कर्मियों व लोगो को खुलेआम धुँआ उड़ाते देखा जा सकता है. नए कानून के तहत सार्वजनिक स्थानों  पर धूम्रपान करते पाए जाने पर दो सौ रूपये जुर्माने का प्रावधान है लेकिन कही भी इस आदेश  का पालन नहीं हो रहा है.

होटलों पर नहीं स्मोकिंग जोन
शहर में कई होटल व रेस्टारेंट है लेकिन किसी में भी धूम्रपान करने वालो के लिए अलग  से स्मोकिंग जोन नहीं है. कई होटल ऐसे है जहा पर आला अफसरों को खुलेआम सिगरेट का सेवन करते देखा जा सकता है. प्रशासन द्वारा कभी भी होटलो पर स्मोकिंग जोन होने या न होने की जाँच नहीं की गई. होटलों,  ढाबो एवं बारो आदि पर पुलिसकर्मी और होटल संचालको की साथ गाथ  के चलते न्यायलय के आदेश की धज्जिया खुलेआम उडाई जा रही है.

प्रतिबंधित क्षेत्र
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जिन सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित किया था उनमे अस्पताल, स्वास्थ्य संस्थान, मनोरंजन पार्क, रेस्टारेंट, न्यायलय भवन, सार्वजनिक कार्यालय, पुस्तकालय, स्टेडियम, शिक्षण संस्थान, रेलवे स्टेसन, बस स्टेंड, शापिंग माल, सिनेमा हाल, नाश्ता कक्ष, काफी हाउस, पब्स बार, एअरपोर्ट लाउंज शामिल है.

बोर्डो पर नहीं अधिकारियो के नाम
नियम के मुताबिक रेलवे स्टेसन , बस स्टेंड तथा शहर के अन्य सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान को रोकने के लिए धूम्रपान निषेध का बोर्ड  तो टांग दिया लेकिन उस पर कार्रवाई के लिए नियुक्त अधिकारी का नाम नहीं है. जबकि आदेशो में साफ़ तौर यह निर्देश दिए थे की सार्वजानिक स्थानों के मालिक, प्रबंधक, सुपरवाइजर या प्रभारी, एक बोर्ड पर उस अधिकारी का नाम अधिसूचित एवं प्रदर्शित करेगे, जिसके पास  धूम्रपान प्रतिबंधित क़ानून के उल्लंघन की सूचना दर्ज कराई जा सके.

दोनों पर जुर्माना का प्रावधान
सार्वजानिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित आदेश को प्रभावी करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक सूचना जारी कर सूचित किया था की यदि सार्वजनिक स्थान के मालिक, प्रबंधक, सुपरवाइजर और अधिकृत अधिकारी नियम के अल्लघन सम्बन्धी शिकायत के निपटारे में लापरवाही के दोषी पाए जाने पर धूम्रपान करने वाले के साथ उन पर भी दो सौ रूपये का जुर्माना किया जाएगा लेकिन अन्य आदेशो के माफिक यह आदेश भी फ़ाइल में ही बंद है.

27 October, 2010

खाद के बढे दामो से किसान हो रहे परेशान

रासायनिक खादों के तेजी से बढ़ते दामो ने किसानो की परेशानी बढ़ा  दी है. कीमते आसमान पर पहुच रही है, उस पर रासायनिक खाद की किल्लत से किसानो की स्थिति बड़ी विकट हो गई है. डी ऐ पी और यूरिया जैसी रासायनिक खादों की अत्यधिक कमी से किसानी को  हर साल जूझना पड़ता है.

मौसम की बेरुखी के चलते किसान लगातार नुक्सान  उठा रहे है. यही वजह है की कई वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी कृषि करने वाले परंपरागत लोग भी अब खेती किसानी छोड़कर दूसरे व्यापार में जुट गए है. वर्षों से खेती किसानी करने वाले रामनाथ पटेल ने बताया की खेती में उन्हें लगातार  घाटा हो रहा था. महगी खाद  और महगे बीज होने की वजह से खेती की लागत दिनों दिन बढ़ रही है. इस पर बाजार में उपज का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा था. अगर मौसम ने साथ दिया तो ठीक वर्ना सारी फसल चौपट हो जाती थी. उनके सामने परिवार पालने का संकट  खड़ा हो गया था. ऐसे में खेती किसानी  को छोड़कर उनके सामने  दूसरा धंधा करने के आलावा कोई और चारा नहीं रह गया था. कमोबेश ऎसी ही हालत दूसरे लघु और सीमान्त किसानो की भी है.

फिर क्या है विकल्प ?
रासायनिक खादों की  तेजी से बढती कीमते किसानो के लिए परेशानी का सबब बन गई है ऐसे में जैविक खाद का विकल्प किसानो को राहत दे सकता है. किसान यदि समस्या का समाधान  चाहते है तो वह जैविक खाद पर आधारित खेती कर सकते है. इससे खेती की लागत कम होने के साथ डी ऐ पी एवं यूरिया खाद पर निर्भरता कम हो जायेगी. जैविक खेती के प्रति जागरूक किसान गणेश सिंह का कहना है की फसलो की बोआई  के समय किसानो को काम छोड़कर खाद के लिए भटकना पड़ सकता है. रासायनिक खाद के लगातार उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति भी कम हो जाती है. इसे रोकने के लिए जैविक खेती जैसा दूसरा कोई अच्छा विकल्प नहीं है. जैविक खादों में वर्मी कम्पोस्ट, नाड़ेफ़ खाद, गोबर खाद, गोबर गैस स्लरी जैसी खादों का उपयोग किया जाता है. यह सभी खाद  किसानो के पास आसानी से उपलब्द्ध हो जाती है.

खाद के दाम प्रति पचास किलो
यूरिया                 282 रूपये
डीएपी                 580 रूपये
इफ्फको               492 रूपये
सुपर फास्फेट       180 रूपये

कुम्हारों को दीपक का सहारा

अखिलेश उपाध्याय 

दायाँ  महगाई की मार चारो ओर नजर आ रही है. महगाई के चलते लोग जरूरत की वस्तुओ को खरीदने में भी काफी कतराने लगे है लेकिन उन्हें त्योहारों की सामग्री उत्सव मनाने खरीदना ही पड़ती है. कुल्हड़ो के बंद होने के बाद अब कुम्हारों को दीपावली पर ही दियो की बिक्री का सहारा रहता है. इन दीपकों पर भी महगाई की मार के चलते कुम्हारों के चेहरों पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही है क्योकि महगाई के चलते आजकल परंपरागत दीयो की जगह विद्युत् दीयो के उपयोग होने लगे है. इस वर्ष महगाई बढ़ने से बहुत कम ही कुम्हार दीये बनाने का कार्य  कर रहे है. उन्हें उम्मीद है की इस बार मौसम अच्छा रहा और बारिश न हुई तो व्यवसाय अच्छा चलेगा

इस बार बढ़ी है कीमत
पिछले वर्ष महगाई के कारण तीस रूपये प्रति सैकड़ा के हिसाब से बिक्री हुई थी लेकिन इस वर्ष बाजारों में दीयोकी संख्या कम होने के कारण चालीस रूपये प्रति सैकड़ा के हिसाब से बिक्री हो रही है. मौसम और दीयो के बाजार में आने वाली मात्रा के हिसाब से प्रतिदिन दामो में कमी बढ़ोत्तरी होती है.

ऐसे बने है दीपक
पीली चिकनी मिटटी, घास-फूस, गोबर के बने कंडे व पतली छनी मिटटी इन सभी सामग्रियों से दीपकों को बनाकर पकाया जाता है. राकेश कुम्हार ने बताया की खेतो से पीली चिकनी मिटटी लाकर उसे सुखाया जाता है. सूखी  मिटटी को साफ़ कर गलाई जाती है. उसमे घोड़ो की लीद मिलाई जाती है इस प्रकार तैयार की गई मिटटी से दीपक बनकर तैयार होते है.

कितने बढे दाम
सामग्री                                      कीमाप्त (पिछले वर्ष )                           कीमत (इस वर्ष )
मिटटी प्रति ट्राली                        600 से 800                                         800 से 1000
गोबर के कंडे प्रति सैकड़ा            30 से 50 रूपये                                   40 से 60 रूपये
घोड़ो की लीद प्रति बोरी             25 से 30 रूपये                                    35 से 40 रूपये
घास-फूस प्रति किलो                  5 से 10 रूपये                                         15 से 20 रूपये

दिवाली पर कबाडियो की बल्ले-बल्ले

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
दिवाली का त्यौहार आते ही कबाडियो का धंधा क्रमशः गति पकड़ने लगा है. इन दिनों व्यर्थ घरो से निकला लोहा-लंगड़ एवं अन्य रद्दी सामन  खरीदने के लिए कबाड़ी शहरों, कस्बो, गांवो की गालिओ में फेरी लगाते दिखने लगे है. ज्यो-ज्यो दिवाली नजदीक आती जाएगी कबाडियो का व्यापार तेजी पकड़ता जाएगा.

शहर में छोटी- बड़ी मिलाकर करीब डेढ़ सैकड़ा दुकाने है जहा कबाड़े का जमकर  व्यापार होता है. शहर में करीब सौ लोग है जो कबाड़ के व्यापार से अपना पेट पालते है. दीपावली के त्यौहार पर साफ़-सफाई की जाती है और इन घरो से निकलने वाले कबाड़ को यह कबाड़ी घर-घर जाकर खरीद रहे है. सुबह से लेकर शाम तक इनका हाँथ ठेला शहर में घूमता रहता है. जो लोगो से कबाड़ खरीदकर उन्हें सामान के दाम चुकाते है. बस स्टैंड में थोक का व्यवसाय करने वाले रिंकू कबाड़ी बताते है की इस समय कई कबाडियों की दुकाने तो अच्छी चल रही है लेकिन कुछ दूकानदार निराश है. अभी यह धंधा मंदा चल रहा है, एक दूकानदार के पास तीन दिन में करीब एक ट्रक कबाड़ एकत्र हो रहा है. जबकि दिवाली के तीन चार दिन पहले एक दिन में दो ट्रक कबाड़ा एकत्र हो जाता है. मंदी का एक कारण यह भी है की अभी कई घरो में साफ़ सफाई का काम शुरू ही नहीं हुआ है. लोग दिवाली के चार दिनों पहले से सफाई करते  है इसके साथ ही कई लोगो को अभी तनख्वाह भी नहीं मिली है जिससे वे घरो की साफ़-सफाई पर ध्यान नहीं दे पा रहे है.

कहाँ  जाता है कबाड़
यह कबाड़ का सामान अधिकतर इन्दोर, मंडीदीप भोपाल, जबलपुर आदि में पहुचाया जाता है, कबाडियो के मुताबिक दीपावली के समय एक दूकानदार करीब तीन ट्रक कबाड़ इन मंडियों  में भिजवाता है. जबकि बगैर सीजन के एक सप्ताह में एक ट्रक बड़ी मुश्किल से माल हो पाता है. उल्लेखनीय है की शहर में ऐसे कई गरीब वर्ग के युवक व बच्चे है जो कबाड़े का व्यवसाय कर अपना रोजगार चलाते है, कबाड़ी सरकू भाईजान बताते है की एक दिन में सौ पचास रूपये मिल जाते है. इस काम में जो जितनी मेहनत करता है उसे उतना दाम मिलता है.

कबाड़ के भाव
लोहा                     12 से 16 रूपये किलो
प्लास्टिक               12 से 14 रूपये किलो
रद्दी                       4 से 6 रूपये किलो
मसाला प्लास्टिक    4 से 5 रूपये किलो

26 October, 2010

पेट्रोल पम्पो पर उपभोक्ताओं को लगाया जा रहा चूना

पेट्रोल पम्पो पर उपभोक्ताओं को लगाया जा रहा चूना
अखिलेश उपाध्याय / कटनी
हर दिन खुलेआम पेट्रोल पम्प उपभोक्ताओं को शहर में लाखो रूपये का चूना लगा रहे है. उपभोक्ता मीटर सेट करवाकर पेट्रोल डलवा लेता है बावजूद इसके अंकगणित  के हिसाब से उसे 2  से 5  पैसे का पेट्रोल कम दिया जाता है. एक पेट्रोल पम्प पर औसतन पांच हजार से अधिक वाहन आते है ऐसे में प्रतिदिन एक से सवा लाख रूपये प्रति पम्प अलग से कमाई हो रही है. खरीदी से अधिक बिक्री हो रही है, वही पेट्रोल पम्पो पर सौ में से पांच ग्राहक ही बिल लेते है. ऐसे में
वैट का सही आकलन करना भी मुस्किल होता है.

नापतौल विभाग के अनुसार मिलीलीटर में कम पेट्रोल देने के मामले में अभी तक किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं की गई है. सच्ची बात तो यह है की पेट्रोल पम्प मालिक एक माह में दो से चार लाख लीटर पेट्रोल मगवाते है, वही दूसरी ओर सेल्स का आकड़ा कंपनी द्वारा सप्लाई का आकड़ा का कंपनी द्वारा सप्लाई किये गए पेट्रोल से अधिक होता है.

नहीं होती कार्यवाही
पेट्रोल पम्पो पर अभी तक केवल मिलावट में ही कार्यवाही की गई है. कम पेट्रोल डालने अथवा कम मिलीमीटर होने पर अभी तक कोई बड़ी कार्यवाही विभाग ने नहीं की है.

आकलन मुश्किल
पेट्रोल पम्पो पर मशीन द्वारा सेट करने के बावजूद पांच पैसे से दस पैसे का पेट्रोल कम दिया जाता है इस तरह प्रति माह लाखो का खेल हो जाता है. हर व्यक्ति बिल नहीं लेता है इससे वादिज्यकर विभाग को खरीदी और बिक्री का आकलन करना मुश्किल होता है. वरिष्ठ निरीक्षक नापतौल के मुताबिक हर एक पेट्रोल पम्पो की मशीनों को प्रति वर्ष जाचा जाता है इन मशीनों को शील भी विभाग द्वारा ही किया जाता है. विभाग का कहना है की ऐसी शिकायत आने पर कार्यवाही करेगे.

ऐसे होता है गणित
शहर में टू व्हीलर सबसे अधिक है. वही यदि आम आदमी पेट्रोल भरवाने जाता है तो वो राउंड फिगर में ही पेट्रोल भरवाता है. मसलन 20 , 30 , 50 , 100 ,२०० और 300 रूपये. यू तो पेट्रोल पम्प पर सेल्स में बताये गए अमाउंट से कम पैसे का ही पेट्रोल डालते है यदि कोई उपभोक्ता मशीन पर सेट भी करवा ले तो भी उसे कम पेट्रोल ही मिलता है.

सेट करवाने पर भी कम
पेट्रोल पम्प के भाव प्रति लीटर पेट्रोल 56 .60 पैसे  है इस हिसाब से 20 , 30 और 50 पर क्रमशः 35 .34 , 53 .01 और 88 .34 पॉइंट पेट्रोल दिया जाना चाहिए लेकिन वास्तविकता में 35 , 53 और 88 पॉइंट ही पेट्रोल दिया जाता है. इस हिसाब से मिलीलीटर को राईटआफ  कर दिया जाता है.

पुराने तर्ज की मशीने
आयल कंपनिया ही मशीने लगवाती है लेकिन कटनी जिले में तो पुराने ढर्रे की मशीने लगी है जिनमे तो और भी गड़बड़ घोटाला किया जाता है. लाईट गोल हो जाने के बाद यहाँ के पेट्रोल पम्पो
पर जनरेटर भी नहीं चलाये जाते ऐसे में हाथ से घुमाकर पेट्रोल देने में तो और भी जमकर उपभोक्ताओं को लूटा जा रहा है.

25 October, 2010

चाँद के दीदार का रहेगा इन्तजार

पति की दीर्घायु का महत्वपूर्ण करवा चौथ व्रत आज मनेगा. महिलाए निर्जला रहकर चाँद के दीदार का इन्तजार करेगी. इसके पूर्व करवा चौथ के व्रत को लेकर महिलाओं में खासा उत्सास देखने को मिला. बाजार में महिलाए परिधान सहित आभूशनो   की खरीदारी करती दिखी.

दुकानों में रही रौनक
करवा चौथ के मौके पर हर पत्नी अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत का पालन पूरे विधि विधान से करती है. इसलिए बाजार में वे मनपसंद कपडे व ज्वेलरी खरीदती देखी गई. दुकानों पर साड़ियो की मांग सर्वाधिक रही. वही कलात्मक  ज्वेलरी व् चूडिया  भी महिलाओं की पहली पसंद रही. साडी की मेचिंग ज्वेलरी की मांग अधिक देखी गई. कांच व डिजाईनर  चूड़िया बहुतायत में खरीदी गई. महिलाओं ने व्रत की तयारी के लिए अपने हाथो में मेहँदी लगवाई. दिन भर बाजार में रौनक रही वही ब्यूटी पार्लर भी भीड़ से खचाखच देखे गए. महिलाओं ने अपनी पसंद के अनुसार पार्लर में जाकर तयारी की शायद ऐसा लग रहा है की महिलाए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है.  

ऐसे करे पूजा
करवा चौत के दिन भगवान् शिव माता पारवती भगवान् कार्तिक, चन्द्रमा देव  और भैरो देव की पूजा की जाती है. सर्वप्रथम सुबह पूजा कर पति के चरण  स्पर्श कर व्रत को आरम्भ करे. व्रत के लिए मिटटी के कलश जिसे करवा कहते है उसके ऊपर दीपक जलाए. उसके बाद घर के आगन में गोबर से पूजा का स्थान लीप कर आटे से चौक बना ले. जेसमे  एक चौक करबा माता का तथा दूसरा अपना  बनाए उसके ऊपर करबा को रखे. करबा से कांसो को लगाए. भगवानको नारियल, जनेऊ, खोवा, हल्दी, सिन्दूर, कांच की चूडिया, टिकली, चावल, फूल, बेल्पती, धुप दीप नैवेध्य अर्पण  करे. उसके बाद आटे व खोवे के तेरह लड्डू चढ़ाये. पूजन स्थल पर पीपल की डाल अवश्य रखे या डाल न मिलने पर मिटटी से पीपल के वृक्ष की आकृति बना ले. चन्द्रमा के निकलने पर चलनी से चंद्रमा के दर्शन करे तथा उसके बाद अपने पति को उसी चलनी से देखे. उसके बाद भगवान चंद्रमा की पूजा करे व पति की भी आरती उतारे. अंत में करवा माता कलश से सात बार फेरे लगाते हुए कलश की जगह बदले. उसके बाद पति के चरण  स्पर्श कारे पति को अपने पत्नी का मीठे  पकवान व पानी पिला कर पारण  करना चाहिए. इस तरह यह व्रत पूरा हो जाता है. करवा माता की कहानी भी अवश्य सुने. सुहागन स्त्रियों को सास को वस्त्र, फल फूल दान करना चाहिए. ऐसे न करने से व्रत अधूरा माना जाता है. सास व ससुर के चरण स्पर्श अवश्य करे क्योकि  सुहागन के परमेश्वर सास ससुर के पुत्र है जो पूज्यनीय होते है.

23 October, 2010

धल्ले से बिक रहा नकली मावा

धल्ले से बिक रहा नकली मावा
अखिलेश उपाध्याय / कटनी
इन दिनों शहरी क्षेत्रो में बड़ी मात्रा में मावा और घी की खेप आसपास के क्षेत्रो से पहुच रही  है. दरअसल कुछ दिनों बाद मिठाइयो का पर्व दीपावली है. ऐसे में कई क्विंटल मावे की खपत होती है. बाजार में बिकने वाले मावे और घी की शुद्धता को लेकर अक्सर लोग सवाल उठाते रहे है. 

दीपावली आते  ही एक बार फिर मिलावटी मावे और घी की शुद्धता को लेकर लोग सवाल उठाने लगे है. दरअसल लोगो की नाराजगी इस बात को लेकर भी है की स्वास्थ्य निरीक्षको द्वारा ऐसे खाद्य पदार्थो की समय-समय पर जाँच नहीं की जाती है. इसी का नतीजा है की शरद पूर्णिमा के त्यौहार पर खराब मावा के प्रयोग करने के बाद रीठी तहसील के ग्राम भरतपुर और मुहास के आधा सैकड़ा लोग उलटी दस्त के शिकार हो गए और उन्हें गंभीर  अवस्था में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रीठी में भरती कराया गया. दो साल के बच्चे से लेकर प्रोढ़ महिला पुरुष सभी पर दूषित मावा खाने से यह असर हुआ
 लोगो की नाराजगी इस बात को लेकर है की स्वस्थ्य निरीक्षको द्वारा ऐसे खाद्य पदार्थो की समय-समय पर जाँच नहीं की जाती है. खासकर दसहरा दिवाली जैसे त्योहारों के मौके पर जब कई क्विंटल मावे की मांग होती है निश्चित ही खाद्य पदार्थो की जाँच की जाना चाहिए ताकि खाद्य पदार्थो में गड़बड़ी करने वालो पर शिकंजा कस सके किन्तु देखा गया है की सम्बंधित विभागों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है.

भूमिका पर सवाल
शहरी क्षेत्र में आने वाला मावा, घी, दूध, दही और मही बड़ी मात्रा में ट्रेन, बस के द्वारा लाया जाता है. लोगो ने सवाल उठाये है की रेलवे हेल्थ इन्स्पेक्टर द्वारा कभी भी खाद्य पदार्थो के नमूने लेने की जहमत नहीं उठाई जाती है. जिससे मिलावटी खाद्य पदार्थो की बिक्री को बढ़ावा मिल रहा है. लोगो ने रेलवे हेल्थ इन्स्पेक्टर की भूमिका पर ही सवाल खड़े किये है. बताया गया है की रेलवे हेल्थ इन्स्पेक्टर कटनी में कम ही मिलते है.

बताया गया है की बीते कई महीने से यहाँ खाद्य निरीक्षक ही नहीं आये है. अंदाजा लगाया जा  सकता है की अपने कर्तव्यों को संवेदनशील पड़  पर बैठे अधिकारी किस ढंग से अंजाम दे रहे है. कटनी के राजेश नेमा ने बताया की ग्रामीण क्षेत्रो से बड़े पैमाने पर मावा, घी और दूध से बने अन्य सामग्री शहरी  क्धेत्र में आती है कई बार उनके द्वरा खरीदे गए घी और मावे में मिलावटी होने का पता भी चला है किन्तु कहा शिकायत कारे ? कुछ ऐसा ही रजनी गुप्ता ने भी बताया. इनके मुताबिक पिछले दिनों कई बार इनके द्वारा मिलावटी घी खरीद लिया गया था जो खरीदने के बाद ही पता चल पाया है की उसमे मिलावट की गई है.
उन्होंने अब घी खाना ही बंद कर दिया है. दिलीप गुप्ता का कहना है की पिछले लम्बे समय से शहर के बाजारों में मावा, घी और दूध से बने अन्य पदार्थो में भारी मिलावट की  जाती है किन्तु यहाँ के खाद्य नरीक्षक ध्यान नहीं देते  है और बड़ी मात्रा में मिलावटी मावा और घी आसानी से बाजार में खप जाता है.

दीपवाली  पर होती बिक्री
आकड़ो के मुताबिक हर वर्ष दीपावली के मौके पर एक टन से ज्यादा मावे की मिठाई शहर वासी हजम कर जाते है और यह मावा क्षेत्र के कुछ हिस्सों से ही आता है. जानकर बताते है की क्षेत्र में दुग्द्ध उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता है और जो होता है उसमे से भी एक बड़ा हिस्सा दूध डेयरी को चला जाता है फिर इतनी बड़ी मात्रा में मावा कहा से आता है. इस सम्बन्ध में विभागों को सतर्कता बरतना चाहिए.

साथ ही विभाग को लोगो की जागरूकता के लिए शुद्ध और मिलावटी में फर्क कैसे किया जाए इस बात कीजानकारी भी उपलब्द्ध कराना चाहिए किन्तु सम्बंधित विभागों की निष्क्रियता के चलते खुलेआम लोगो के स्वास्थ्य से खिलवाड़ हो रहा है.

नागरिको  का कहना है
अधिकारियो  के जागरूक न होने से कटनी जिले में बड़ी मात्रा में मिलावटी मावे की सप्लाई बीते लम्बे समय से हो रही है. यहाँ सम्बंधित विभागों को ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि लोगो के स्वास्थ्य को नुक्सान न हो सके
-रामस्वरूप तिवारी, रिटायर्ड बी ई ओ, रीठी
ट्रेन द्वारा बड़ी संख्या में कटनी के शहरी क्षेत्र में धल्ले  से मिलावटी मावा और घी बिक रहा है. इस सम्बन्ध में हम लोगो ने पहले भी कई बार मांग उठाई है किन्तु  रेलवे खाद्य नितिक्षक और शहरी खाद्य निरीक्षक कोई ध्यान  नहीं दे रहे है और इन लोगो की लापरवाही से लोगो के स्वास्थ्य से मजाक किया जा रहा है
-मनोज तिवारी, कार्यकर्त्ता उपभोक्ता फोरम
सम्बंधित अधिकारियो की मिलीभगत से मिलावटखोरो को बढ़ावा मिलता है इसके लिए कानून में सख्त प्रावधान है जिसके तहत मिलावट खोरो पर कार्यवाही की जा सकती है किन्तु सम्बंधित विभागों का इस ओर बिलकुल भी ध्यान नहीं है.
-रमेश निगम, कटनी

22 October, 2010

स्कूली शिक्षा के लिए अब बरसेगा धन


अखिलेश उपाध्याय / कटनी
पहली से आठवी तक के बच्चो को स्कूल की देहलीज तक लाने  के लिए चलाये जा रहे सर्वशिक्षा अभियान की तर्ज पर अब नवी और दसवी कक्षा में विद्यार्थियों को स्कूल तक लाने  और उन्हें शैक्षणिक सुविधाए उपलब्द्ध कराने के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान शुरू किया जा रहा है.
इस अभियान को अमलीजामा पहनाने के लिए जिला शिक्षा विभाग पिछले एक वर्ष से तैयारियों में जुटा है, इस अभियान में भी शैक्षणिक संसाधनों के लिए सर्व शिक्षा अभियान की तरह करोडो रूपये आने  की सम्भावना है.

क्या है उद्देश्य
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान में इसका दायरा बढाकर नवी और दसवी कक्षा को भी शामिल किया गया है. इसका प्रमुख  उद्देश्य कक्षा दस  तक के बच्चो को शतप्रतिशत शिक्षा मुहैया कराना है, जिसमे लोकव्यापीकरण के साथ ही शैक्षणिक  गुद्वात्ता को भे बेहतर बनाना है.

क्या है अभियान
एक सर्वे के मुताबिक नवी और दसवी कक्षा तक आते-आते तीस फीसदी से अधिक बच्चे पढ़ाई छोड़  देते है. कटनी जिला की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. कटनी जिले के शिक्षा का ग्रोथ इन्वोल्व्मेंट रेसो सत्तर फीसदी से बजी  कम है. राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत इसे 2012 तक 75 प्रतिशत तक लाने  का लक्ष्य रखा गया है तथा 2017 तक इसे शतप्रतिशत करने की योजना है

बच्चो का सर्वे होगा
सर्व शिक्षा अभियान के तहत चलाये जाने वाले स्कूल चले हम कार्यक्रम की भाती कार्यक्रम चलाकर पढाई छोड़ने वाले बच्चो को चिन्हित किया जाएगा तथा ऐसे बच्चो की जानकारी एकत्रित कर उन्हें स्कूल में प्रवेश दिलाया जाएगा जिससे उनकी शिक्षा  में कोई रूकावट नहीं आ सके.

करवा चौथ के दिन चन्द्रमा की पूजा क्यों ?

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करवा चौथ के दिन चन्द्रमा  की पूजा क्यों ?
अखिलेश उपाध्याय

स्त्रियों के ऐसे अनेक व्रत और त्यौहार होते है जिनमे दिनभर उपवास के बाद रात्रि में जब चन्द्रमाँ उदय होता है तब अर्ध्य देकर तथा विधिवत उसकी पूजा करने के उपरांत ही वे अन्न जल ग्रहण करती है. कई व्रत एवं त्योहारों में चंद्र्र्मा की पूजा अर्चना क्यों की जाती है इसका कारण बताते हुए ज्योतिर्विद पंडित इन्द्र पाल शास्त्री ने बताया की  शास्तानुसार सौभाग्य, पुत्र, धन-धान्य , पति की रक्षा एवं संकट टालने के लिए चंद्रमा की पूजा की जाती है. करवाचौथ का व्रत सुहागिन स्तरीय अपने अखंड सुहाग और पति के स्वस्थ व दीर्घायु होने की मंगल कामना हेतु करती है.

चंद्रमा के पूजन से होते सभी कष्ट दूर
उन्होंने बताया की छन्दोग्य उपनिषद के चौथे प्रपाठक के बारहवे खंड में कहा गया है की जो चन्द्रमा में पुरुष रुपी ब्रह्म को इस प्रकार जानकार उसकी उपासना करता है वह उज्जवल जीवन व्यतीत करता है, उसके सारे कष्ट दूर होते है सारे पापकर्म नष्ट हो जाते है. वह लम्बी और पूर्ण आयु पाता है. उसके वंशज भी इसी फल को पते है.

ऐसे करे पूजा
चन्द्रमा  मन का देवता है और मन की चंचलता को नियंत्रित करता है. हमारे शरीर में दोनों ध्रुवो के मध्य मस्तक प्रधान  माना गया है. यहाँ पर रोली, चन्दन आदि का टीका और  विंदी लगाईं जाती है जो चंद्रमा को प्रसन्न करनियंत्रण करती है.

क्या है  पुराणों में वर्णन
कथा के अनुसार चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की कन्याओं से हुआ था जब चंद्रमा ने दक्ष की बेटियों पर पूरा ध्यान नहीं दिया तो वे नाराज होकर अपने पिता के पास पहुची. दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्रमा को क्षय रोग से पीड़ित होने का शाप दे दिया. चन्द्रमा ने शिव से प्रार्थना कर उन्हें प्रसन्न किया. शिवजी ने उन्हें अपने मस्तक पर ले लिया शिवजी विष्णु भगवान के पास पहुचे. उन्हेंने चन्द्र के दो रूप कर दिए, एक को दक्ष को सौप  दिया, दूसरा शिव्जे के मस्तक पर बैठा दिया.

21 October, 2010

आज आसमान से पूरी रात बरसेगा अमृत

अखिलेश उपाध्याय 

 शरद पूर्णिमा भारतीय इतिहास में पुरातन समय से चला आ रहा एक मात्र ऐसा उत्साव् है जो सचमुच प्रकृति का एक अनुपम तोहफा है. यह वास्तव में अमृत की तरह पवित्र है. शरद महोत्सव को लेकर लोगो ने सभी तैयारिया कर ली है तथा बाजार में दूध तथा मावा की खपत भी बढ़ गई है.

शरद पूर्णिमा के गूढ़ रहस्य के बारे में पंडित अमरनाथ शास्त्री ने बताया की  भारतीय सनातन संस्कृति में अबाध गति से चले आ रहे व्रत त्यौहार पर्व हमारे लिए आनंद ही नहीं प्रेरणा एवं भाईचारे का सन्देश लेकर आते है. केवल भारतीय संस्कृति ही वह जीवंत संस्कृति है जिसमे पर्व,व्रत, त्यौहार आनंददायक ही नहीं बल्कि - सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः का सन्देश देता है.

आश्विन के अंत में आनंद का पर्व शरद पूर्णिमा जिसे अमृत प्रशन पर्व भी कहते है. मर्केंडेय पुराण में तीन प्रकार की रात्रियो का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार कालरात्रि , महारात्र्ही व मोहरात्रि है. जिसमे मोहरात्रि का मतलब यह काल विशेष आनंद प्राप्त कर स्वयं को भूलने का है. यह वह संधिकाल है जहा वर्षा ऋतू का समापन और शरद ऋतू प्रारंभ कहा जाता है. इस मोहरात्रि को शरद पूर्णिमा की रात्रि कहा जाता है  जिसमे आधी वर्षा  तो नहीं होती किन्तु शीतल फुहारे होती है. इस रात सागर में ज्वार भाता आता है तब सागर की लहरे आसमान  छूती है. मानो वे अपने प्रियतम से मिलने आतुर है. अतः यह पर्व प्रेम का प्रतीक है.

भागवत महापुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा को भगवान कृष्ण का गोपियों के साथ रास हुआ था, इस रति में सभी लोग खुले आसमान के नीचे शरद पूर्णिमा की शीतल बयार एवं पूर्ण चन्द्र की शीतल चांदनी में प्रकृति के अनुपम रूप का नजारा  देखते है. यदि यह स्थान प्राकृतिक रमणीय  स्थल हो तो बात ही कुछ अलग हो और इसका आनंद ही कुछ अलग होता है. इसी आनंद का भरपूर फायदा उठाने के लिए प्रकृति प्रेमी इस दिन नदी, तालाब, सागर और जहा प्राकृतिक सौन्दर्य की भरमार हो वहा पर पहुचकर पूरी रात आनंद लेने से नहीं चूकते. खासकर मसूरी, दार्जिलिंग, वृन्दावन, भेडाघाट , पचमढी, महाबलेश्वर आदि सुरम्य पार्वतीं क्षेत्र शरद पूर्णिमा के दिन पर्यटकों के साक्षी है.

शरद  पूर्णिमा का महत्व क्यों
कहते है इस रति को अधिपति देव इन्द्र ने भगवान का गोपियों के साथ रास लीया पर आस्मांस से अमृत बरसाया था और वे गोपिया  अमर होकर भगवान श्रीकृष्ण के साथ एकाकार हो गई थी. तभी से इस रात की याद में आज भी जब तक आकाश के पूर्ण चंद की छाया दूध में न दिखाई दे यह पर्व एक प्रकार से भगवान् इन्द्रदेव की आराधना का भी होता है ताकि वर्षाकाल में उनके द्वारा की गई बरसात से खेतो में अन्न , पर्वतो, जंगलो में प्रचुर मात्रा में घास व वनस्पति हो. इसी कामना के साथ हम  शरद पूर्णिमा की रात्रि इन्द्र भगवान का पूजन करके उन्हें धन्यवाद देते है और मध्यरात्रि तक खुले आसमान के नीचे दूध उबालते है ताकि प्रसाद  रुपी उस दूध में जिसे हम अमृत समझकर लेते है जिसके पीछे  यही भावना होती है की शायद आकाश से बरसने वाली अमृत की बूंदे हमें प्राप्त हो.

परस्पर रेडियो संवाद कार्यक्रम की मानिटरिंग नहीं हो रही


 अखिलेश उपाध्याय / कटनी


अकादमिक सत्र 2009 -10 में परस्पर रेडियो संवाद कार्यक्रम का प्रसारण दिनांक 21 .07 .10 से प्रारंभ हो गया है, कार्यक्रम का प्रसारण आकाशवाणी के सभी केन्द्रों एवं ज्ञानवानी के भोपाल, इन्दोर व जबलपुर केन्द्रों से दोपहर १२.०० से ०१.०० बजे तक प्रसारित किया जाता है.


जबकि देखा गया है के प्रदेश के अनेक प्राथमिक विद्यालयों में या तो रेडियो उपलब्द्ध नहीं है या रेडियो ख़राब पड़े है. जहा पर रेडियो ठीक है वहा पर कार्यक्रम बच्चो को सुनवाया नहीं जा रहा है. यह अत्यंत ही चिंता का विषय है सभी प्राथमिक शालाओं की समय सरणी में कार्यक्रम के प्रसारण का प्रावधान है. आयुक्त राज्य शिक्षा केंद्र भोपाल द्वारा अपने पत्र क्रमांक रशिक्के/आई आर आई/09 -10 /88813 भोपाल दिनांक 21 .10 .10 में प्रदेश के समस्त बी आर सी को निर्देश दिए है की यह सुनिश्चित कर्र्ये की यह कार्यक्रम सुचारू रूप से चल रहा है ं तथा प्रसारण प्रत्येक शाला में बच्चो को सुनवाया जा रहा है ताकि  जिले  के सभी बच्चे इस कार्यक्रम से लाभान्वित हो सके.

मौके पर इस कार्यक्रम के सुचारू रूप से सञ्चालन की मानिटरिंग करने पहुचे अधिकारिओ को एक प्रतिवेदन पर जाँच करना है जिसमे कुछ इस तरह से सवाल किये जाएगे-
कितनी शालाओ में रेडियो चल रहे है.
जिले में कितनी शालाओ में आई आर आई कार्यक्रम से सम्बंधित रजिस्टर संधारित है
क्या जिले की सभी शालाओं में आई आर आई मार्गदर्शिका उपलब्द्ध है
क्या बच्चे रेडियो के पांच पात्रो के नाम जानते है जैसे -
(सियार, तुलसी, चंदा, राजू अरु तोता )
कार्यक्रम  के दौरान क्या रेडियो-छात्र- शिक्षक तीनो में परस्पर संवाद हो रहा है.
जिले में कितने कार्यक्रमों का प्रसारण हो  रहा है

महगाई की मार

नवरात्र के समापन के साथ ही नागरिको ने दीपोत्सव की तैयारिया भी शुरू कर दी है इसके तहत घरो की साफ़-सफाई, लिपाई-पुताई, पेंट आदि कार्य शुरू हो गए है लेकिन दिन दूनी, रात चौगुनी बढती महगाई ने पुताई भी महगी कर दी है. इससे लोगो के विशेषकर मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट गड़बड़ा चुके है.

घरो की पुताई, दरवाजो, खिडकियों पर पेंट करने के लिए मजदूर भी महगे दामों पर ही मिल रहे है.बढती महगाई का हवाला देते हुए मजदूरों ने भी अपनी मजदूरी बढ़ा दी है. 150 रूपये से 250 रूपये तक प्रतिदिन के हिसाब से मजदूर मिल रहे है. पुताई का कम शुरू होते ही चूना, गेरू, पेंट, डिस्टेम्पर आदि की बिक्री शुरू हो गई है. दुकानों के थोक विक्रेताओं के यहाँ से तहसील स्तर के विक्रेता थोक में क्विन्तालो से चूना  आदि पुताई की सामग्री अपने क्षेत्रो में ले जाने लगे है लेकिन महगाई के कारण उन्हें भी पसीना आ रहा है. चूना विक्रेताओं की माने तो जहा गत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष चूने पर दो से तीन रूपये प्रतिकिलो महगाई में इजाफा हुआ है  इससे चूना सात रूपये किलो बिक रहा है. चूने के दाम आठ से नौ रूपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ने की सम्भावना बताई जा रही है.

20 October, 2010

कहा गायब हो गए नियम और कायदे कानून...

बिना हवा और पानी के चल रहे पेट्रोल पम्प
अखिलेश उपाध्याय
कटनी/ जिला मुख्यालय सहित जिले भर में सभी पेट्रोल पम्प के सञ्चालन में भारत पेट्रोलियम और इंडियन आयल ने जो शर्ते रखी थी उनका पालन जिले में न के बराबर पेट्रो पम्पसंचालक कर रहे है. हैरत की बात है की सम्बंधित विभाग इस मामले में क्यों कोई कार्यवाही नहीं कर रहा जिससे वाहन संचालको को आवश्यकता पड़ने पर दिक्कतों का सामना करते हुए अपनी जेब हलकी करने मजबूर होना पड़ रहा है.
पेट्रोल पम्प के विषय में जानकारों का कहना है की किसी भी स्थान पर पेट्रोल पम्प के संचालक से पूर्व खाद्य विभाग, नापतौल विभाग और सम्बंधित कंपनी द्वारा शासन के नियमानुसार एक नियमावली तैयार की जाती है इन शर्तो के पालन के बाद भी किसी स्थान पर पेट्रोल पम्प संचालित होते है लेकिन देखने में आ रहा है की  जिले में इक्का दुक्का पेट्रोल पम्प को यदि छोड़ दिया  जाए तो कोई भी पेट्रोल पम्प संचालक इन नियमो का पालन नहीं कर रहा है. इसके बावजूद भी इससे सम्बंधित विभाग कार्यवाही से कोसो दूर नजर आ रहे है.

तीन  माह में होती जाँच
नियमानुसार खाद्य विभाग द्वारा प्रत्येक तीन माह के दौरान जिले के पेट्रोल पम्पो पर सेम्पलिंग की जाती है इस दौरान यदि किसी पट्रोल पम्प पर किसी प्रकार की गड़बड़ी पाई जाती है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही की जाती है लेकिन क्या हकीकत में विभाग अपने इस कर्त्तव्य का द्रध्तापूर्वक पालन कर रहे है. जबकि शहर में ही करीब एक दर्जन पेट्रोल  पम्प संचालित है जो नियम को ताक पर रख संचालित किये जा रहे है.

नापतौल विभाग  बेफिक्र
पेट्रोल पम्पो पर मिलने वाले डीजल, पेट्रोल के मानको एवं सही नापतौल की जाँच के लिए नापतौल विभाग को एक निश्चित समयावधि के दौरान जाँच करनी होती है लेकिन शायद विभाग इसमें उदासीन भाव दिखाता  है. उपभोक्ताओं के वाहनों में कितना  डीजल और पेट्रोल पम्प से भरा जा रहा है यह मात्र मीटर देखकर ही महसूस किया जा सकता है. पेट्रोल पम्प से कम पेट्रोल एवं डीजल देने की आये दिन घटनाएं सामने आती है बावजूद इसके कोई कार्यवाही नहीं होती है.

वाहनों पर फूटता ठीकरा
आम इंसान अपनी गाढ़ी कमाई से वाहनों में ईधन भरवाने के लिए पेट्रोल पम्प पर तो पहुचता है लेकिन उसकी गाडी उतना माइलेज नहीं देती है  जितने  के विषय में प्रचारित किया जाता है. वाहन संचालक भी पेट्रोल पम्प पर विवाद करने के बजाय स्वयं की गाडी का रख रखाव  सही नहीं होने का ठीकरा फोड़ते हुए चुपचाप जितना पम्प से ईधन दिया जाता है उसके अनुसार मिलने वाले माइलेज से ही संतुष्ट हो जाता है. वैसे भी लोगो की सोच  यह रहती है की जरा-जरा सी बातो के लिए अब क्या विवाद करना. कई लोग जल्दबाजी के चलते भी बहस आदि में समय गावाना फिजूल समझते है. इसी का फायदा पेट्रोल पम्प संचालक उठाते है.

न हवा है न पानी और न छाया
शहर के अधिकांस पेट्रोल पम्प ऐसे है जहा निःशुल्क हवा पानी की व्यस्था ही नहीं है जबकि जानकारों का कहना है की इंडियन  आयल एवं भारत पेट्रोलियम के जितने भी पम्प है उन्हें वाहन चालको  एवं संचालको के लिए हवा और पानी की पर्याप्त व्यस्था करना आवश्यक है लेकिन नियमो का कही भी पालन होता नजर  नहीं आ रहा है. पानी की तो उतनी जरूरत नहीं पड़ती मगर हवा की और छाया की जरूरत तो जरूर पड़ती है पर हर पेट्रोल पम्प पर हवा के उपकरण अक्सर खराब ही रहते है. कभी बिजली नहीं होने का तो कभी अन्य कोई कारण बता कर पीछा छुड़ा लिया जाता है.

क्या  कहते है वाहन चालक
पेट्रोल पम्प से वाहन की टंकी में कितना पेट्रोल दिया  जा रहा है यह प्रमाडित ही नहीं होता है. बस मीटर देखकर ही संतुष्टि कर ली जाती है की जितने पैसे दिए है उतना पेट्रोल मिल गया है. 
- याजुवेंद्र सिंह राजपूत, रीठी
सब काम अंदाज पर चलता है. मेरे द्वारा एक बार कम पेट्रोल दिए  जाने का विरोध करने पर पम्प कर्मचारियों द्वारा पुनः मशीन खराब होने का हवाला देकर पेट्रोल दे दिया गया था. ऐसे भी बहुत से उपभोक्ता है जो विरोध नहीं करते
- जीतेन्द्र यादव, कटनी
जिले के पेट्रोल पम्पो की हालत यह है की यहाँ पर न तो शौचालय है और न ही पीने के पानी और टायरो में हवा भराने की व्यस्था है. सम्बंधित विभाग को समय-समय पर नागरिको के हित में निरिक्षण करना चाहिए
- सुरेश सकवार, जिला पंचायत सदस्य कटनी 
पेट्रोलियम कंपनी की गाइड लाइन में प्रत्येक पेट्रोल पम्प संचालक को शौचालय हवा, पानी और छाया की व्यस्था करने के साथ-साथ अग्निशमन यन्त्र भी लगाना आवश्यक है लेकिन नियमो का पालन कही होता नजर नहीं आता है.
- हरिशंकर दुबे, कटनी

19 October, 2010

हाई लिविंग एंड हाई थिंकिंग का चालान बढ़ रहा


अखिलेश उपाध्याय  
जैसे-जैसे समय बदल रहा है वैसे-वैसे लोगो की सोच में परिवर्तन आने लगा है. एक जमाना था जब आम इंसान रोटी, कपडा और मकान के पीछे भागते-भागते पूरी जिन्दगी जद्दोजहद करता था लेकिन फिर भी मकान का सपना पूरा नहीं हो पता था लेकिन बदलते परिवेश में अब तीनो के अलावा भी लोग दिखावे और जरूरत के लिए नए-नए शौक पूरे करने में भी पीछे नहीं हट रहे है. यही कारण है की अब हिन्दुस्तानियों  के रहन-सहन में तेजी से बदलाव आने लगा है.


चकाचौध ने किया प्रभावित
इंसान  भी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती के अलावा उन चीजो का उपयोग भी करता है जो उसके लिए व्यक्तिगत रूप से जरूरी नहीं है लेकिन वह समाज के लोगो से बराबरी करने के लिए करता है. बुद्धिजीवी बर्ग का कहना है की आम इंसान को भी दुनिया की चकाचौध ने प्रभावित किया है. वह उन बड़े इंसानों की तरह रहना चाहता है जो उनके लिए आदर्श है या जो समाज में लोगो के लिए एक ब्रांड है उनके रहन-सहन से प्रभावित होकर उन्ही की तरह  रहना चाहता है.


प्रचार प्रसार से आय बदलाव
कुछ लोग इसका एक अन्य मुख्य कारण टेलीविसन  को भी मानते है लोगो का कहना है की टीवी ने जहा आज घर-घर में आम वस्तुओ को भी उपयोग करने के लिए बड़े रूप में दिखा कर प्रस्तुत किया है जिससे आम इंसान मानसिक रूप से प्रभावित हुआ है. वही बैंक सेक्टरो द्वारा दिए जा रहे हर कार्य के लिए ऋण ने भी इंसान को अपने शौक की वस्तुओ को खरीदने की राह आसान कर दी है. टेलीविसन में प्रचारित किये जाने वाले विज्ञापनों को देखकर भी लोगो की सोच में ख़ास बदलाव आय है.


सपना नहीं रही कार
करीब डेढ़ दशक पूर्व इंसान के लिए कार खरीदना मुस्किल होता था यह आम व्यक्तिओ के लिए तो एक सपना ही समझी जाती थी लेकिन आज लोग एक से एक लक्जरी गाडिया लोन लेकर खरीद रहे है. इसका मतलब  यह नहीं की वे मात्र  शौक या दिखावे के लिए ही कार या अन्य वस्तुए खरीद रहे है. दरअसल सुविधाओं की प्राप्ति के लिए लोगो के मन में आज के विज्ञापनों ने एक अलग मानसिकता बनाई है.

इनसे हुआ जीवन स्तर में सुधार
आम तौर पर लोगो के लिए अपना जीवन स्तर प्रदर्शित करने के लिए कार और मकान ऐसे साधन है जो उन्हें समाज में एक स्तर प्रदान करते है. वही महगे मोबाईल सेट्स खरीदना हालाकि अब यह अत्यधिक प्रचलित हो जाने के कारण  इनका रुझान कुछ कम हुआ है अब लोग कारो को जल्द से जल्द बदलकर नई कारे लेने  में रूचि रखने लगे है.


दूसरे से अलग दिखने की होड़
वाहनों के नाम पर जहा मात्र  स्कूटर होना बड़ी बात हुआ करती थी कार से यदि कोई इंसान घर पर आता था तो पूरे मोहल्ले वाले पूछते थे की कौन आया था. वही आज बड़ी और महगी कारो से लोग आते है उसके बाद भी किसी को इतना फर्क नहीं पड़ता यह जीवन स्तर में सुधार ही है की आज हर बड़ी चीज आम आदमी की पकड़ में है.
पहले समाज के इक्का दुक्का लोगो के पास कारे हुआ करती थी वही आज हजारो की संख्या में दौडती महगी  कारे यह बताती है की आज हर इंसान अपने आप को दूसरे से अलग दिखाना चाहता है.


मकान भी एक जरिया
पिछले बीस वर्ष की बात करे तो बहुत अधिक कालोनिय बनी है और यह प्रक्रिया सतत जारी भी है. आज बैंको के द्वारा होम लोन आसानी से मिल जाने के कारण हर इंसान अपना मकान बनाना चाहता है. पहले जहा लोग पांच से दस लाख के स्वतंत्र बंगले खरीदकर अपने आप को उच्च वर्ग के समझते थे वही अब पच्चीस से पचास लाख तक के मकानों को भी  आम समझा जाता है.


क्या कहते है लोग
पहले मै ज्यादा ध्यान नहीं देता था की कौन क्या खरीद रहा है लेकिन अब लोगो को जब जीवन स्तर में सुधार के लिए तत्पर देखता हूँ तो मेरे मन में भी उनसे लड़ने का ख्याल आता है इसलिए मै भी हर दो तीन वर्ष में कार बदल लेता हूँ
- सुरेश त्रिपाठी, जबलपुर
पहले  जहा घर में लेंडलाइन फोन था जिसका  बिल 250 से 300 रूपये आता था तो पसीना छूट जाता था आज घर में पांच सदस्यों के पास मोबाइल है जिसका खर्च जोड़ा जाए तो एक हजार से अधिक हो जाता है लेकिन कुछ नहीं कर सकते. 
- संतोष पटेल, कटनी
बाजार में आये दिन एक से एक बढ़िया मोबाइल आ रहे है और उनकी कीमअत भी दिनों दिन कम होती जा रही है जिससे हर व्यक्ति मोबाइल का शौक  करने  लगा है ऐसे में अलग मोबाइल दिखने की चाह में बदलना जरूरी हो जाता है.
- सुरेन्द्र सेंगर, ग्वालियर

महीनो बाद भी पूरी नहीं मिलती पेंसन


अखिलेश  उपाध्याय / कटनी
महीनो बीत जाने के बाद भी पेंसन की राशी पूरी नसीब नहीं होती. जितनी होती ही उसके लिए भी सुबह से शाम तक बैंक में खड़े रहना पड़ता है. यह कहना है उन बुजुर्ग और असहायों का जो सरकार की विभिन्न पेंसन योजनाओं के तहत अपने अधिकारों के लिए हैरान परेशान है. इन थके हरे लोगो में अब इतनी कुब्बत भे नहीं बची की अपनी आवाज उठा सके. आगे शिकायत करने कहा और किसके पास जाना है ? इसका भी इन्हें कोई अत पता नहीं. लिहाजा ये जब भी जितना पैसा मिलता है उसी में मन मसोसकर रहा जाते है. 

क्या कहते है बुजुर्ग
किसी  महीने दो सौ रूपये पकड़ा दिए जाए है तो किसी मही सौ रूपये ही दिए जाते है. हर महीने पैसे दिए भी नहीं जाते. कभे कम्पुटर ख़राब होने का बहन बनाकर भगा दिया जाता है. गाँव के पोस्ट आफिस में बैठे पोस्टमास्टर पांच से दस रूपये प्रति भुगतान पर लेते है. दो-दो तीन-तीन महीने बाद पैसा मिलता है. पासबुक में जितना लिखा होता है उतना नहीं दिया जाता. 

कितना होना चाहिए भुगतान
सामाजिक सुरक्षा पेंसन १५० रूपये प्रति माह
निःशक्त पेंसन योजना १५० रूपये प्रति माह
विधवा पेंसन योजना १५० रूपये प्रति माह
विधवा पेंसन (दितीय ) २०० रूपये प्रति माह
वृद्धावस्था पेंसन २७५ रूपये प्रति माह

यह  हो रहा है
भुगतान के लिए कोई तारिख तय नहीं
बन्हने बनाकर चलता कर दिया जाता है
पासबुक में महीनो तक एंट्री नहीं होती
बैंककर्मी दन्त फटकार करते है
हर माह भुगतान नहीं किया जाता
पेंसन धरी आगे शिकायत नहीं कर पाते
दिन  भर भूखे प्यासे खड़े रहते है
जितनी एंट्री उतना भुगतान नहीं होता

17 October, 2010

स्कूली बच्चो पर मलेरिया का खतरा

अखिलेश उपाध्याय
कटनी/ जिले के स्कूली बच्चो पर मलेरिया एवं डेंगू जैसी बीमरिओ का खतरा मडरा  रहा है. अस्सी फीसदी   स्कूलों में चौतरफा जबरदस्त गंदगी का आलम व्याप्त है. नियमित कक्षाओं में सफाई नहीं होती है तो स्कूलों के शौचालयों की दुर्गन्ध विद्यार्थियों को बीमारी का आमंत्रण दे रही  है. जिले के अधिकांश स्कूलों पर इन बीमारियों का खतरा है.

सुद्ध पानी की कोई व्यस्था नहीं
कई स्कूलों में बच्चो के लिए साफ़ पानी की कोई व्यस्था नहीं है. इन  स्कूलों में पानी की टंकी को सालो से साफ़ नहीं किया गया है, इन दिनों स्कूल के विद्यार्थी बहुत अधिक  संख्या में बीमार हो रहे है जिसको लेकर पालको ने आरोप लगाया है की स्कूल प्रबंधन की लापरवाही से सफाई व्यस्था ठप्प पड़ी है.

नहीं दी जा रही कोई सलाह
जिले के विभिन्न स्कूलों में डेंगू  और मलेरिया जैसी बीमारियों से बचाव के लिए विद्यार्थियों  को जागरूक  करने के लिए कोई पहल नहीं की जा रही है.जबकि कार्यशालाओ के मध्यम से छात्रो को जागरूक किया जाना था. इसके लिए शिलसिलेवार अभियान भी चलाया जाना चाहिए था. लेकिन जिम्मेदार लोगो ने कभी भी इस ओर ध्यान नहीं दिया इस कारण छात्रो में जागरूकता नहीं आ पाई. अँधेरे कमरों में लगने वाले इन सरकारी स्कूलों में साफ़ सफाई न होने से मच्छर तो दिन में भी इन कमरों में मौजूद होते है.

मध्यान्ह भोजन में सफाई का ध्यान नहीं
स्कूलों में परोसा जाने वाला मध्यान भोजन भी बीमारी का संकेत दे रहा है. इन स्कूलों में खुले में बच्चो को भोजन कराया जा रहा है जो असुरक्षित है.

16 October, 2010

विजय पर्व विजयादशमी पर सभी को हार्दिक शुभकामनाये

विजय पर्व विजयादशमी पर सभी को हार्दिक शुभकामनाये

असत्य पर सत्य की जीत
बुराई पर अच्छाई की जीत

अखिलेश उपाध्याय  

टेक्स पैड बिना खप रहा लाखो रूपये का सामान

अखिलेश उपाध्याय
कटनी
दीपावली के त्यौहार को देख व्यापारियों ने माल का स्टाक शुरू कर दिया है प्रतिदिन बाजार में लाखो का सामान बिना टेक्स पेड़ किये लाया जा रहा है. इस टेक्स चोरी में शहर के तीन दर्जन से अधिक प्लास्टिक  व्यापारी शामिल है. बिना टेक्स पेड़ माल को दशहरे के बाद बाजार में खपाया जाएगा. हर माह करोडो रूपये की प्लास्टिक सामग्री  का व्यापर करने वाले ये प्लास्टिक व्यापारी टेक्स के नाम पर चंद रूपये ही अदा करते है और कारोबार करोडो रूपये का करते है. दीपावली त्यौहार से बढ़ी  प्लास्टिक सामग्री की मांग को देख बाजार में करोडो रूपये का माल टेक्स चोरी कर आ गया है, ये माल दशहरे के बाद बाजार में खपाया जायेगा.
 
इस टेक्स चोरी में न केवल फुटकर विक्रेता शामिल है बल्कि थोक विक्रेता भी है. शहर में हर माह करीब  तीन  करोड़ रूपये की सामग्री का व्यापर होता है. यह प्लास्टिक की सामग्री अधिकांश मात्रा में बाहर से आती है. थोक विक्रेताओं द्वारा बाजार में प्लास्टिक का काम किया जाता है जिसमे दोनों व्यापारियों द्वारा मिलकर टेक्स की चोरी की जा रही है.
सूत्र बताते है की व्यापारियों द्वारा माल तो हजारो रूपये का खरीदा और बेचा जाता है लेकिन कागजो में लिखा पढ़ी सैकड़ो में ही की जाती है इस खेल में हजारो रूपये के टेक्स की चोरी की जाती है. प्लास्टिक की सामग्री का व्यापार करने वाले छोटे-बड़े मिलाकर कुल एक सैकड़ा से अधिक व्यापारी है. इनमे करीब तीन दर्जन वह व्यापारी है जो प्लास्टिक का थोक का काम करते है. थोक व्यापारियो द्वारा बाहर से माल मगाकर शहर में सप्लाई का काम किया जाता है. जानकार सूत्रों के अनुसार इन व्यापारियों ने दीपावली के लिए दरोड़ो रूपये का मॉल मंगा लिया है.
प्लास्टिक की सामग्री का व्यापर शहर के व्यापारियों द्वारा गुजरात के वापी और दमन दीव से किया जाता है. गुजरात में प्लास्टिक  की फेक्टरियो के सी एंड ऍफ़ अधिक संख्या में है वही दमन दीव में फेक्ट्रीय है यहाँ पर सरकार द्वारा उत्पादन शुल्क नहीं लिया जाता है. हालाकि छोटे स्तर पर माल मगाने  का काम आगरा और दिल्ली  से भी किया जाता है.
आखिर कैसे होती है टेक्स  चोरी
गुजरात और दमन दीव से ट्रको द्वारा माल देश भर में सप्लाई किया जाता है. इसमें कंपनियों द्वारा टेक्स चोरी के लिए खरीदार व्यापारी को आधे माल का बिल और शेष माल उसकी साख पर दे दिया जाता है. ऐसे व्यापारी और कंपनिया मिलकर  हजारो रूपये की टेक्स चोरी करती है. वही थोक व्यापारियों द्वारा टेक्स  चोरी के लिए कच्चे पर्चे का सहारा लिया जाता है. व्यापारियों द्वारा फुटकर विक्रेताओं को माल की आधी कीमत का बिल दिया जाता है. फुटकर व्यापारी जितनी राशी का बिल होता है उससे दुगनी कीमत का भुगतान थोक व्यापारी को कर देता है.

क्यों बिगड़ा मासिक बजट

अखिलेश उपाध्याय
तेजी से बढ़ रही महगाई ने बाजार को गर्म कर दिया है. पिछले माह में खाद्य सामग्री के दामो में बीस फीसदी तक बढ़ोत्तरी हुई. खाद्य सामग्री के दामो में हुई वृद्धि इस बार दीपावली के त्यौहार पर रसोई को ठंडी रखेगी. मध्यम वर्गीय परिवारों की रसोई पर इसका असर अभी से देखा जा सकता है. बेतहाशा बढ़ रही महगाई ने घरो का मासिक बजट भी बिगाड़ दिया है. स्थिति यहाँ तक है की पांच हजार से कम पगार पर काम करने वाले लोग दीपावली के त्यौहार  को लेकर अभी से चिंतित है.
एक माह के राशन पर आठ माह पहले जो परिवार चार हजार रूपये खर्च करता था अब वह उसी राशन  पर करीब पांच हजार रूपये खर्च कर रहा है. पिछले आठ माह में दाल, आटा, घी और दूध के दामो में बीस फीसदी तक बढ़ोत्तरी हुई है. इसने मध्यम बर्गीय परिवारों की गृहणियो का बजट बिगाड़ दिया है. इस दौरान गृहणियो की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई है. एक गृहणी ने बताया की वह हर माह बजट से पैसो में से 300 -400 रूपये की बचत करती थी लेकिन पिछले कुछ माह से वह बचत नहीं कर पा रही है और पिछले कुछ माह से नहीं हुई बचत दीपावली के त्यौहार पर रसोई को ठंडा करेगी.
पिछले वर्ष खाद्य सामग्री की पैदावार में कमी  होने एवं वायदा व्यापर को बढ़ावा मिलने  के कारण पिछले कुछ समय से खाद्य सामग्री के दामो में लगातार इजाफा हो  रहा है लेकिन मध्यम वर्गीय परिवारों एवं नौकरी पेशा वाले परिवारों की मासिक आय में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है. इस वजह से गृहणियो का मासिक बजट डगमगा गया है, जिसका सीधा असर रसोई पर पड़ रहा है.
दीपावली के त्यौहार के बाद खाद्य सामग्री के दामो में कमी होने की सम्भावना है. दीपावली के बाद बाजार में खाद्य सामग्रियों की नई फसल आ जायेगी. बताया जा रहा है की बाजार में नई फसल के आने के बाद दाम कम हो सकते है.
क्या कहती है गृहणिया
पहले चार हजार रूपये में एक माह का राशन आ जाता था लेकिन अब पांच हजार के आसपास आता है, दीपावली के त्यौहार पर भी कंजूसी करनी पड़ेगी - सविता ठाकुर
पहले हर माह तीन  सौ से चार सौ की बचत हो जाती थी जो त्यौहार के समय काम आ जाती थी लेकिन पिछले कुछ महीनो से एक पैसा भी नहीं बचा -  कुसुम तिवारी
महगाई के कारण महीने का खर्च पूरा भी नहीं होता है, लेकिन क्या करे घर में जितना पैसा होगा उससे ही काम चलाना मजबूरी है, हर वस्तुओ के दाम तेजी से बढ़ते है इसके आलावा स्थानीय व्यापारी वस्तुओ के दाम अधिक बढ़ा देते है.- अनीता सिंह
मेरे पति का स्वयं का व्यवसाय है व्यापर अच्छा चलता था लेकिन अब महगाई के कारण कम बिक्री हो रही है इसलिए मुनाफा भी कम हुआ है - सीमा  ताम्रकार

आठ माह में बीस फीसदी बढे खाद्यान्न के दाम
शक्कर पहले 27 रूपये                     अब 30 रूपये किलो हो गई है
हल्दी पहले 250                               अब 340
आटा पहले 16                                   अब 22
मसाले पैकेट 50                                अब 75
चाय      125                                      अब 220
देशी घी 250                                     अब 300
इलाची 1000                                       अब 2100
चना डाल 25                                     अब 28  
(सभी भाव प्रति किलो में )

15 October, 2010

त्योहारों के मौसम में कालाबाजारी

अखिलेश उपाध्याय
कटनी
जिले में शासकीय राशन वितरण केन्द्रों की मनमानी से गरीबो को राशन नहीं मिल रहा है. उनके हिस्से की खाद्य सामग्री की कालाबाजारी हो रही है. त्योहारों के मौसम को देखते हुए लगभग सभी राशन दुकान संचालक गरीबो को कम राशन  का वितरण कर रहे है. इसके पीछे वजह कम आवंटन होने की बात कर रहे  है.
दीपावली और दशहरा तथा कई और पर्वो के नजदीक आते ही शहर के सभी कंट्रोल संचालक गेंहू , चावल, केरोसिन शक्कर का कोटा बी पी एल एवं अति गरीबी कार्डधारियो को न देकर उसे खुले बाजार में बेच देते है, खास बात यह है की यह घालमेल खाद्य निरीक्षको की जानकारी में होता है. निरीक्षक सिर्फ उस पर ही कार्यवाही करते है जो उनके बनाए नियम से काम नहीं करते.
ऐसे होती है कालाबाजारी
बी पी एल और ऐ पी एल का सस्ता राशन पहले स्टाक कम बाटकर स्टाक करना और बाद में उसको बेच देना.. किसी दुकान से एक ट्रक गेहू गायब ओ जाता है तो किसी दुकान से पांच दस क्विंटल शक्कर या चावल. जाँच में लीपापोती कर दी जाती है. ग्रामीण अंचलो में दो महीने में एक बार राशन और केरोसिन वितरित किया जाता   है. इसी प्रकार पुराने स्टाक की जानकारी दिए बगैर नया आवंटन मिल जाता है. बगैर निरीक्षको की जानकारी के ऐसा होना संभव नहीं है.
अभी ठंडी  पड़ी मुहिम
वर्तमान में खाद्य विभाग ने राशन दुकानों पर कार्यवाई करना तो जैसे छोड़ ही दिया है. जबकि यह सबको अच्छी तरह से मालूम है की  संचालक केरोसिन, शक्कर और गेहू को ब्लेक में बेच रहे है. रजिस्टर में फर्जी एंट्री कर कोटा किसी और को दिया जा रहा है. रीठी में हाल ही में जनपद पंचायत अध्यक्ष प्रीति सिंह ने तो रंगे हाथो केरोसिन में सौ लीटर पानी मिला होना पकड़ा था. लेकिन इस पर अभी तक न तो कलेक्टर, एस डी एम्  और न ही खाद्य अधिकारी ने कोई भी कार्यवाही की है.
इससे साफ़ जाहिर होता है की इस काले कारनामे में सभी लिप्त है.

मिलावटी पेट्रोल से बेदम होते वाहन

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
कटनी/ पेट्रोल्पम्पो पर इन दिनों धड़ल्ले से मिलावटी पेट्रोल खपाया जा रहा है. हालाकि हर पम्प संचालक ऐसा नहीं कर रहा है  लेकिन जो पेट्रोल पम्प रसूखदार लोगो के है उन  पर मिलावटी पेट्रोल का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है. खाद्य विभाग के अधिकारिओ का सरक्षण प्राप्त इन दबंग पेट्रोल पम्प संचालको के खिलाफ कोई भी आवाज उठाता है तो उस पर किसी  भी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं होती.
मिलाते है मिटटी का तेल
शहर के कुछ पेट्रोल पम्प संचालक पेट्रोल में मिटटी के तेल की मिलावट कर रहे है. पम्प परिसर में पेट्रोल के टेंक होते है जिसकी क्षमता तीस हजार लीटर तक होती है. इन टेंको में गुपचुप तरीके से मिटटी के तेल की मिलावट कर दी जाती है. चूकी पेट्रोल की कीमत मिटटी के तेल के  मुकाबले अधिक है इसका भरपूर फायदा  पम्प संचालक उठाते है.
स्टाक  में हेरफेर
जो लोग पेट्रोल पम्प के मिलावट के धंधे में शामिल है वह बड़े शातिर दिमाग से काम करते है. इसके चलते शुरूआत में बिक्री रजिस्टर में कम दिखाई  जाती है, जब पेट्रोल की मात्रा कम बचती है तो रजिस्टर में दर्ज आकड़ो के हिसाब से पेट्रोल की मात्रा करने के लिए मिटटी के तेल का उपयोग किया जाता है इसके बाद इसी तेल को खपाया जाता है जिससे तगड़ी आय होती है.
नहीं होती कार्यवाही
खाद्य विभाग के पास यदि किसी पम्प के खिलाफ शिकायत पहुचती है तो पहले तो उसे काफी हलके में liya  जाता है लेकिन यदि फरियादी हंगामा मचाता  है तो पम्प संचालक को देखकर कार्यवाही की जाती है यदि सामान्य पेट्रोल पम्प मालिक है तो कार्यवाही थोड़ी बड़ी हो जाती है लेकिन यदि कोई दबंग पम्प संचालक है तो विभाग वहा झाकने तक नहीं जाता है और कार्यालय पर बैठे-बैठे ही क्लीन चिट दे दी जाती है.
नहीं पहुचते अधिकारी
रीठी में स्थित पेट्रोल पम्प एक राजनेता का है इसलिए खाद्य बिभाग के अधिकारी कभी इस तरफ झाकते तक नहीं है इसी प्रकार बाकल में स्थित पेट्रोल पम्प भी सत्ताधारी दल के नेता का है इसलिए यहाँ भी कभी कोई कार्यवाही नहीं हुई.
नीले केरोसिन का काला खेल
नीले तेल के काले खेल पर रोक लगाने में खाद्य विभाग लगभग नाकाम रहा है. क्योकि खाद्य विभाग के उच्च अखिकारी  कालाबाजारी रोकने के नाम पर केवल कंट्रोल संचालको की निगेहबानी दिखाते रहते है जबकि थोक एवं सेमी होल्सेलरो के बारे में कभी पड़ताल तक नहीं की जाती है देहात में तो फिर भी कुछ खाद्य निरीक्षक पकड़ धकड़ करते है लेकिन शहर में तो इनको टटोला तक नहीं जाता है. खाद्य महकमा हमेशा छोटी मछलियों को पकड़कर अपनी पीठ  थपथपाता है जबकि अधिकारिओ का वरदहस्त प्राप्त असली मगरमच्छो के खिलाफ कभी  कोई कार्यवाही नहीं की जाती है जो लीटरो    में नहीं बल्कि सीधे ड्रमो का ही खेल कर देते है और गरीब जनता का पूरा हक़ ब्लेक में निकाल देता है.
कैसे होती है कालाबाजारी
थोक एवं सेमी होल्सेलारो के यहाँ से जब कंट्रोल संचालक माल उठाते है तो पहले ही सौदा तय हो जाता है इसके चलते नोडल जब एंट्री कर देता है और महीने की 6 , 7 तथा 8 तारीख को जब जनता को मॉल बाँट दिया जाता है तो बचा हुआ माल वापस थोक एवं सेमी होल सेलरो के पास पहुच जाता है. इसमें कुछ जगह तो ऐसा भी किया जाता है, की कंट्रोल  संचालक आधा माल उठाते है इसके बाद आधे माल को बड़े मगरमच्छो के पास ही  कटवा दिया जाता है.
कितने में लेते है ड्रम
थोक एवं सेमी होलसेलर से कंट्रोल संचालक जो ड्रम उठाते है वह दो सौ लीटर का होता है जो लगभग 1900 का पड़ता है. जबकि जो ड्रम कंट्रोल संचालको से खरीदते है उसके दाम 4000 -4200 के बीच होता है. कट्रोल संचालक इसलिए  थोक एवं सेमी होल सेलरो को ड्रम बेच देते है क्योकि इसमें रिस्क कम होता है जबकि खुले में एक ड्रम 4700 -5200 तक का जाता है.

14 October, 2010

असमय मौत के शिकार हो रहे है.

अखिलेश उपाध्याय
लोगो द्वारा उपयोग में लाई जा रही पालीथीन जानवरों के लिए मौत का कारण बन रही है. इसके बाद भी लोग इसका उपयोग बंद नहीं कर रहे है जबकि केंद्र और राज्य शासन ने दस माईग्रेन  से पतली पालीथीन के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा रखा है.

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रो में पालीथीन का उपयोग इतना ज्यादा बढ़ गया है की लोगो ने कपड़ो के थैले बाजार ले जाना बंद कर दिया है. लोग बिना थैले के ही सामान खरीदने के लिए आ जाते है और पालीथीन में सामान लेकर चलते बनते है. बाद में इस पालीथीन को सडको और घरो के आस-पास फेक दिया जाता है जो उड़कर नालियों को चोक कर देती है, जिससे नाली की गंदगी सडको पर फैलती है. वही पालीथीन में भरकर फेके गए सामान को खाने से जानवर इस पालीथीन को लील जाते है और वे असमय मौत के शिकार हो रहे है.
पर्यावरण और जानवरों को मौत से बचाने के लिए पालीथीन पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए. लोगो को भी पालीथीन का उपयोग बंद कर जागरूकता का परिचय देना चाहिए.

13 October, 2010

हाँथ धुलाई कार्यक्रम संदेह के घेरे में

എ ए
अखिलेश उपाध्याय

स्कूली बच्चो के लिए मध्य प्रदेश में आयोजित किया जा रहा हाथ धुलाई कार्यक्रम संदेहों के घेरे में आ गया है. पिछले वर्ष भी यह कार्यक्रम प्रदेश में आयोजित किया गया था, लेकिन क्या सुधार हुआ ? स्कूलों में बच्चो की हकीकत स्वयं बाया कर रही है.


गुरूवार 14 .10 .2010 को एक बार फिर यह कार्यक्रम राजधानी सहित सभी संभागीय और ग्यारह जिला मुख्यालयों पर आयोजित किया जा रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है की जब करोडो रूपये बरबाद करके स्कूले में समग्र स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है तो आखिर ऐसे आयोजन करने की क्या जरूरत है. ग्रामीण अंचलो में स्कूली बच्चो की आड़ में जो समग्र स्वच्छता अभियान चलाया जा राह है वह भी कटघरे में नजर आ रहा है.

चार साल से अपडेट नहीं हुई बेवसाईट

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
शासन की ओर से वर्ष 2005 में समस्त विभागों में सूचना के अधिकार अधिनियम को लागू कर दिया गया है. अधिनियम को लागू होने के साथ ही शासन के सभी विभागों को शासन के पोर्टल पर अपनी वेब साईट विकसित करने के निर्देश दिए गए है. इस साईट में सभी विभागों के लोक सूचना अधिकारी और अपीलीय अधिकारिओ की जानकारी प्रदर्शित की गई है लेकिन कटनी जिले के अधिकतर विभागों ने अपनी जानकारी को पोर्टल पर अपडेट नहीं किया है.इतना ही नहीं कुछ विभाग तो ऐसे भी है जिन्होंने अपना ब्यौरा तक साईट पर प्रदर्शित नहीं किया है.

अधिनियम के रूप में पारित सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के प्रति अधिकारी कर्मचारी बहुत उदासीन है. जिले के 54 विभागों में से किसी भी विभाग की साईट पर जानकारी अपडेट नहीं है. जबकि विभागों को नियमित रूप से सूचना का अधिकार के अंतर्गत अपनी जानकारी विभाग के पोर्टल पर डालनी चाहिए थी. कटनी जिले की साईट  पर शासकीय विभागों की कोई भी जानकारी न पाकर लोगो को परेशानी का सामना करना पड़ता है.

जिला पंचायत विभाग
इस विभाग ने अपने साईट को वर्ष 2007 के बाद से अपडेट  नहीं किया है. जिले के लोगो को छोटी-छोटी जानकारी के लिए जिला पंचायत कार्यालय के चक्कर काटने पड़ते है. फिर उन्हें सम्बंधित बाबू सिवाय घुमाने के और कुछ नहीं करते.

शायद कटनी जिले के अधिकारी पोर्टल पर जानकारी न देकर लोगो को जिले में चल रहे घोटाले से दूर ही रखना चाहते है.

केरोसिन में पानी मिलाकर बेंच रहे

अखिलेश उपाध्याय / कटनी

सार्वजनिक वितरण प्रडाली के तहत आम जानो को मिलने वाले रसन और केरोसिन में इस कदर भ्रष्टाचार व्याप्त है की इसमें लगे कर्मचारी और अधिकारी ही जनता के माल को ठिकाने लगाने में जुटे है.

जनपद पंचायत रीठी में जनता की शिकायतों पर जब यहाँ की जनपद अध्यक्ष श्रीमती प्रीति सिंह ने शनिवार ०९ अक्टूबर को वितरण किये जा रहे केरोसिन की जाँच की तो उसमे पानी मिला पाया. केरोसिन वितरण कर रहे सेल्समन ने स्वीकार की रीठी सहकारी समिति के समिति प्रबंधक अरविन्द पाठक के कहने पर शुक्रवार की रात में उसने लगभग सौ लीटर पानी मिलाया.



रीठी जनपद अध्यक्ष प्रीति सिंह ने मौके पर पंचनामा बनाया और कटनी एस डी एम् शुश्री छवि भारद्वाज एवं कलेक्टर एम् शेल्वेंद्रम को जनता के साथ हो रहे छलावे में लिप्त दोषी अधिकारी एवं कर्मचारी पर तत्काल कार्यवाही की मांग की है.