15 October, 2010

मिलावटी पेट्रोल से बेदम होते वाहन

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
कटनी/ पेट्रोल्पम्पो पर इन दिनों धड़ल्ले से मिलावटी पेट्रोल खपाया जा रहा है. हालाकि हर पम्प संचालक ऐसा नहीं कर रहा है  लेकिन जो पेट्रोल पम्प रसूखदार लोगो के है उन  पर मिलावटी पेट्रोल का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है. खाद्य विभाग के अधिकारिओ का सरक्षण प्राप्त इन दबंग पेट्रोल पम्प संचालको के खिलाफ कोई भी आवाज उठाता है तो उस पर किसी  भी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं होती.
मिलाते है मिटटी का तेल
शहर के कुछ पेट्रोल पम्प संचालक पेट्रोल में मिटटी के तेल की मिलावट कर रहे है. पम्प परिसर में पेट्रोल के टेंक होते है जिसकी क्षमता तीस हजार लीटर तक होती है. इन टेंको में गुपचुप तरीके से मिटटी के तेल की मिलावट कर दी जाती है. चूकी पेट्रोल की कीमत मिटटी के तेल के  मुकाबले अधिक है इसका भरपूर फायदा  पम्प संचालक उठाते है.
स्टाक  में हेरफेर
जो लोग पेट्रोल पम्प के मिलावट के धंधे में शामिल है वह बड़े शातिर दिमाग से काम करते है. इसके चलते शुरूआत में बिक्री रजिस्टर में कम दिखाई  जाती है, जब पेट्रोल की मात्रा कम बचती है तो रजिस्टर में दर्ज आकड़ो के हिसाब से पेट्रोल की मात्रा करने के लिए मिटटी के तेल का उपयोग किया जाता है इसके बाद इसी तेल को खपाया जाता है जिससे तगड़ी आय होती है.
नहीं होती कार्यवाही
खाद्य विभाग के पास यदि किसी पम्प के खिलाफ शिकायत पहुचती है तो पहले तो उसे काफी हलके में liya  जाता है लेकिन यदि फरियादी हंगामा मचाता  है तो पम्प संचालक को देखकर कार्यवाही की जाती है यदि सामान्य पेट्रोल पम्प मालिक है तो कार्यवाही थोड़ी बड़ी हो जाती है लेकिन यदि कोई दबंग पम्प संचालक है तो विभाग वहा झाकने तक नहीं जाता है और कार्यालय पर बैठे-बैठे ही क्लीन चिट दे दी जाती है.
नहीं पहुचते अधिकारी
रीठी में स्थित पेट्रोल पम्प एक राजनेता का है इसलिए खाद्य बिभाग के अधिकारी कभी इस तरफ झाकते तक नहीं है इसी प्रकार बाकल में स्थित पेट्रोल पम्प भी सत्ताधारी दल के नेता का है इसलिए यहाँ भी कभी कोई कार्यवाही नहीं हुई.
नीले केरोसिन का काला खेल
नीले तेल के काले खेल पर रोक लगाने में खाद्य विभाग लगभग नाकाम रहा है. क्योकि खाद्य विभाग के उच्च अखिकारी  कालाबाजारी रोकने के नाम पर केवल कंट्रोल संचालको की निगेहबानी दिखाते रहते है जबकि थोक एवं सेमी होल्सेलरो के बारे में कभी पड़ताल तक नहीं की जाती है देहात में तो फिर भी कुछ खाद्य निरीक्षक पकड़ धकड़ करते है लेकिन शहर में तो इनको टटोला तक नहीं जाता है. खाद्य महकमा हमेशा छोटी मछलियों को पकड़कर अपनी पीठ  थपथपाता है जबकि अधिकारिओ का वरदहस्त प्राप्त असली मगरमच्छो के खिलाफ कभी  कोई कार्यवाही नहीं की जाती है जो लीटरो    में नहीं बल्कि सीधे ड्रमो का ही खेल कर देते है और गरीब जनता का पूरा हक़ ब्लेक में निकाल देता है.
कैसे होती है कालाबाजारी
थोक एवं सेमी होल्सेलारो के यहाँ से जब कंट्रोल संचालक माल उठाते है तो पहले ही सौदा तय हो जाता है इसके चलते नोडल जब एंट्री कर देता है और महीने की 6 , 7 तथा 8 तारीख को जब जनता को मॉल बाँट दिया जाता है तो बचा हुआ माल वापस थोक एवं सेमी होल सेलरो के पास पहुच जाता है. इसमें कुछ जगह तो ऐसा भी किया जाता है, की कंट्रोल  संचालक आधा माल उठाते है इसके बाद आधे माल को बड़े मगरमच्छो के पास ही  कटवा दिया जाता है.
कितने में लेते है ड्रम
थोक एवं सेमी होलसेलर से कंट्रोल संचालक जो ड्रम उठाते है वह दो सौ लीटर का होता है जो लगभग 1900 का पड़ता है. जबकि जो ड्रम कंट्रोल संचालको से खरीदते है उसके दाम 4000 -4200 के बीच होता है. कट्रोल संचालक इसलिए  थोक एवं सेमी होल सेलरो को ड्रम बेच देते है क्योकि इसमें रिस्क कम होता है जबकि खुले में एक ड्रम 4700 -5200 तक का जाता है.