27 October, 2010

कुम्हारों को दीपक का सहारा

अखिलेश उपाध्याय 

दायाँ  महगाई की मार चारो ओर नजर आ रही है. महगाई के चलते लोग जरूरत की वस्तुओ को खरीदने में भी काफी कतराने लगे है लेकिन उन्हें त्योहारों की सामग्री उत्सव मनाने खरीदना ही पड़ती है. कुल्हड़ो के बंद होने के बाद अब कुम्हारों को दीपावली पर ही दियो की बिक्री का सहारा रहता है. इन दीपकों पर भी महगाई की मार के चलते कुम्हारों के चेहरों पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही है क्योकि महगाई के चलते आजकल परंपरागत दीयो की जगह विद्युत् दीयो के उपयोग होने लगे है. इस वर्ष महगाई बढ़ने से बहुत कम ही कुम्हार दीये बनाने का कार्य  कर रहे है. उन्हें उम्मीद है की इस बार मौसम अच्छा रहा और बारिश न हुई तो व्यवसाय अच्छा चलेगा

इस बार बढ़ी है कीमत
पिछले वर्ष महगाई के कारण तीस रूपये प्रति सैकड़ा के हिसाब से बिक्री हुई थी लेकिन इस वर्ष बाजारों में दीयोकी संख्या कम होने के कारण चालीस रूपये प्रति सैकड़ा के हिसाब से बिक्री हो रही है. मौसम और दीयो के बाजार में आने वाली मात्रा के हिसाब से प्रतिदिन दामो में कमी बढ़ोत्तरी होती है.

ऐसे बने है दीपक
पीली चिकनी मिटटी, घास-फूस, गोबर के बने कंडे व पतली छनी मिटटी इन सभी सामग्रियों से दीपकों को बनाकर पकाया जाता है. राकेश कुम्हार ने बताया की खेतो से पीली चिकनी मिटटी लाकर उसे सुखाया जाता है. सूखी  मिटटी को साफ़ कर गलाई जाती है. उसमे घोड़ो की लीद मिलाई जाती है इस प्रकार तैयार की गई मिटटी से दीपक बनकर तैयार होते है.

कितने बढे दाम
सामग्री                                      कीमाप्त (पिछले वर्ष )                           कीमत (इस वर्ष )
मिटटी प्रति ट्राली                        600 से 800                                         800 से 1000
गोबर के कंडे प्रति सैकड़ा            30 से 50 रूपये                                   40 से 60 रूपये
घोड़ो की लीद प्रति बोरी             25 से 30 रूपये                                    35 से 40 रूपये
घास-फूस प्रति किलो                  5 से 10 रूपये                                         15 से 20 रूपये