12 October, 2010

खाद्य व स्वास्थ्य विभाग नहीं ले रहे सेम्पल

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
चंद  माह पहले ही 12 से 18 रूपये लीटर के भाव से बिक रहे दूध के दाम अब 20 -25 रूपये लीटर पहुच गए है. इस अत्यावश्यक व दैनिक उपयोगी पेय का व्यापर करने  वाले इसका कारण बढती महगाई को बताकर अपना पल्ला झाड़ रहे है, और नगरनिगम प्रशासन मूकदर्शक बना तमाशा देख रहा है. इस चक्कर में पिस रहा है गरीब व  माध्यम बर्ग का उपभोक्ता जिसका घरेलू बजट पहले से ही बढी महगाई ने चौपट कर रखा है.

शहर के आसपास ग्रामीण अंचलो से आने वाले दूध विक्रेताओं व डेयरी संचालको ने भले ही महगाई की दुहाई देते हुए दूध के दाम बढ़ा दिए है लेकिन इसके बाद भी दूध की क्वालिटी में कोई सुधार नहीं हुआ है. देखा गया है की एक लेटर दूध में सौ ग्राम पानी होना तो आम बात है लेकिन अब तो एक लेटर दूध को डेढ़ लीटर बनाने का खेल चल रहा है, अगर ग्राहक द्वारा आपत्ति की जाती है तो दूध बाले दो टूक जबाब देता है की सुद्ध दूध चाहिए तो 32 रूपये खर्च करने पड़ेगे. संपन्न वर्ग तो 32 रूपये लीटर के भाव से दूध खरीद भी लेते है लेकिन गरीब व मध्यमवर्ग के नौकरी पेशा परिवार पानी मिला दूध का ही 20 से 25 रूपये चुकाने को विवश है.

गृहणी पुष्पा शर्मा  का कहना है की पहले तो दूध वाला जिस बर्तन में दूध नाप कर जाता था उसे दूसरे बर्तन में पलटने पर पहले बर्तन में दूध की एक परत चिपकी नजर आती थी, लेकिन अब तो पता नहीं चलता की इस  बर्तन में दूध डाला गया है या नहीं. सिविल लाइंस निवासी आरती सिंह ने   ऐसी ही शिकायत करते हुए बताया की उसने जब दूध वाले से शिकायत की तो यह कहकर अपना दामन बचाने लगा की क्या करे महगाई बढ़ गई है. आजाद चौक निवासी बबिता बघेल ने तो घटिया दूध मिलने के कारण अब डेली नीड्स की दुकानों से साँची दूध खरीदना शुरू कर दिया है, देखा गया है की शहर के डेयरी संचालको ने जहा दूध के मनमाने दाम निर्धारित कर लिए है वही गाँव से शहर पहुचने वाले दूध बेचने वालो ने भी उनका अनुशरण कर लिया है.

पशुपालन के प्रति घटा रुझान
जानकारी के मुताबिक बढती आबादी की तुलना में दूध के उत्पादन में बढ़ोत्तरी नहीं हो पा रही है. मवेशियों व खली, चुनी एवं भूसा के दामो में हो रही बढ़ोत्तरी के कारण शहर में कुछ डेयरी जहा बंद हो रही है वही कुछ बंद होने की स्थिति में पहुच गई है. बताया जाता है की शहर के आसपास चरनोई भूमि का आभाव भी इसका एक कारण माना जा रह है.  वही ग्रामीण अंचलो में पशुपालन खली चुनी व भूसे के दामो में बढ़ोत्तरी  के चलते अब कम संख्या में पशु पालन कर रहे है. पूर्व में अच्छी फसल होने पर उन्हें भूसा खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी लेकिन पिछले कुछ बर्षो से उत्पादन में गिरावट के कारण भूसा बाहर से खरीदना पड़ता है.

नहीं होती चेकिंग
ग्रामीण अंचलो से शहरों में दूध बेचने वाले दूध विक्रेता किस क्वालिटी का दूध लोगो को बेच रहे है इस बात की न तो खाद्य विभाग को चिंता है और न ही प्रशासन ऐसे दूध वालो पर किसी भी प्रकार की रोकथाम करने में अभी तक कामयाब रहा है. उल्लेखनीय है की घरेलू उपयोग के लिए जाने वाले दूध में अशुद्धियो के चलते लोगो में तरह-तरह की बीमारिया फैलने की आशंका रहती है. वही इस बात से भी नहीं नाकारा जा सकता है यह मिलावटी दूध विक्रेता किस जगह का पानी दूध में मिलाने के लिए उपयोग कर रहे है. यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में दूध के प्रति लोगो में असमंजस की स्थिति निर्मित हो सकती है.