29 November, 2010

खुले आम दिन में सबके सामने

प्रदेश सरकार भले ही लोक सेवा गारंटी अधिनियम बनाकर लोक हित का ढिढोरा  पीट रही है लेकिन वास्तविकता तो यह है की भ्रस्टाचार में यदि कोई पिस रहा है तो वह है किसान और गरीब. मजबूरो और गरीबो को ठगने का यह काम कही और नहीं प्रशासन के सामने खुले आम दिन में सबके सामने चल रहा है.

जिला पंजीयक और उपपंजीयक कटनी  के  दफ्तर के  सामने ही स्टाम्प वेंडर दस का स्टाम्प बीस  रूपये में बेच रहे है. कमीशन के इस खेल को देख रहे अधिकारी भी शिकायत आने के इन्तजार में बैठे रहते है.
सोमवार को दिनेश उपाध्याय   को सूचना के अधिकार के तहत जानकारी निकंलने  के लिए दस रूपये के दो गैर न्यायिक स्टाम्प की आवश्यकता थी. उन्होंने कचहरी परिसर में स्टाम्प विक्रेता से दो स्टाम्प देने को कहा. इस पर स्टाम्प विक्रेता ने उनसे स्टाम्प ख़त्म होने की बात कही. थोड़ी देर भटकने के बाद दिनेश फिर से उसके पास पहुचे तो उन्होंने दस के स्टाम्प के बदले बीस रूपये मांगे. दिनेश ने बीस रूपये में स्टाम्प लेने से मना कर दिया और वह दूसरे वेंडर के पास गए तो वहा भी स्टाम्प न  होने की बात कही गई.
चूकी दिनेश को जल्दबाजी थी इसलिए उन्होंने दस का स्टाम्प बीस में मजबूरन खरीदा. यह किस्सा सिर्फ दिनेश के साथ घाटा हो ऐसा नहीं है बल्कि उनके जैसे सैकड़ो लोग इसी तरह स्टाम्प वेंडरो के द्वारा ठगे जा रहे है. यदि वेंडरो के मौके पर स्टाक रजिस्टर जांचे जाये तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी की उनके पास वास्तव में स्टाम्प होते है जो की वे ग्राहकों की कमी की बात बताकर ग्राहक से औने पौने दामो में बेच रहे है.
जिला पंजीयक, उपपंजीयक  कार्यालय द्वारा इस ओर कभी भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती. जबकि जानकर सूत्रों की माने तो जिले में इस समय स्टाम्प की कोई भी कमी नहीं है.
ऐसे में  जो विक्रेता स्टाम्प की कमी बताकर अधिक पैसा वसूल रहे है प्रशासन को  उनकी जाँच करके उनके लायसेंस समाप्त कर  करना चाहिए.
इस विसंगाई के बारे में बिलहरी के विनोद शंकर शर्मा ने बताया की यहाँ आकर तो रोजाना लोग लुटते है. हर दिन हजारो की संख्या में लोगो लो अदालत का काम पड़ता है और यहाँ पर कमीशन और घूस दिए बिना कोई काम नहीं होता. किसी अधिकारी से शिकायत भी करो तो कोई सुनने वाला नहीं है. इसी तरह बहोरिबंद के मनोज तिवारी ने बताया की वकील जैसा कहता है वैसा करना पड़ता है. वकील ने यदि कहा की टिकट लेकर आओ तो लाना ही पड़ता है. अगर यहाँ कीमत से ज्यादा पैसा नहीं दे तो वेंडर बोल देता है स्टाम्प नहीं है. जबकि स्टाम्प विक्रेता स्टाम्प की कमी बताकर जरूरतमंदों से अधिक पैसा वसूलते है. एक स्टाम्प विक्रेता ने बताया की यह  सारा खेल जिला कोषालय से होता है. कोषालय के कर्मचारी हमें समय पर स्टाम्प नहीं देते और कमी का हवाला देने लगते है. जब तक उनको अतिरिक्त कमीशन नहीं दो तब तक वह स्टाम्प नहीं देते. इससमे सब कमीशन का खेल है और भुगतना पड़ता है तो आम आदमी को.