30 October, 2010

बिना शिक्षक के लग रही शाला

बिना शिक्षक के लग रही शाला
कटनी /  जनपद पंचायत रीठी में स्थित शासकीय हाई स्कूल पटोहा में शनिवार को विद्यार्थी तो मौजूद थे लेकिन स्कूल में अधिकांस शिक्षक और शिक्षिका अनुपस्थित थे. ऐसे में बिना शिक्षक - शिक्षिकाओं के स्कूल संचालित हो रहा था. इस लापरवाही का खुलासा जनपद पंचायत रीठी की अध्यक्ष प्रीति सिंग द्वारा शाला के आकस्मिक निरिक्षण के दौरान हुआ.
जनपद अध्यक्ष रीठी ने शिक्षिको की इस लापरवाही से जिला शिक्षा अधिकारी को अवगत करा दिया है. उन्होंने बताया की शनिवार को शासकीय हाई स्कूल पटोहा का आकस्मिक निरिक्षण किया तो उस दौरान एस के तिवारी उपस्थिति पंजी में लाल पेन से आन ड्यूटी लिख गए थे.
इसी तरह मधुलिका दुबे प्रयोगशाला सहायक दिनांक 28 .10 से अनुपस्थित है वही शाला में उपस्थित शिक्षको ने बताया की मधुलिका दुबे की दी गई पढाई की जिम्मेवारी से वे कतराती है और उन्होंने पढ़ाने से स्पष्ट मना कर दिया है.
इस सम्बन्ध में जब विद्यार्थियों  से जानकारी ली तो विद्यार्थियों ने बताया की प्रतिदिन सुबह 11 .30 बजे के बाद ही शिक्षक एवं शिक्षिका शाला में पहुचते है और दोपहर चार बजे के पूर्व ही शाला से चले जाते है.
ग्रामीणों ने जनपद अध्यक्ष प्रीति सिंह को बताया की हाई स्कूल पटोहा में पदस्थ शिक्षको द्वारा नियमित रूप से शाला में उपस्थित नहीं होने और निर्धारित समय पर शाला में नहीं पहुचने से विद्यार्थियों के अध्ययन पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है.

अब नहीं भेजते ग्रीटिंग

कटनी /
त्योहारों के आगमन होते ही अपने प्रियजनों को भेजे जाने वाले शुभकामना सन्देश  यानि ग्रीटिं  कार्ड का चलन इन दिनों सूचना क्रांति के रूप में मोबाईल व कम्पुटर के बेतहाशा उपयोग की वजह से कम हो गया है. जिसकी वजह से गिफ्ट  सेंटरों में ग्रीटिंग कार्ड की मौजूदगी कम ही दिखाई दे रही है.
बदलते परिवेश व आधुनिकीकरण की वजह से सब कुछ हाईटेक होता जा रहा है. संचार की विभिन्न सुविधा होने  की वजह से अब ग्रीटिंग कार्डो के मध्यम  से शुभकामनाये देने वालो की कमी बढती  जा रही है. अन्यथा पूर्व में शुभ अवसरों पर प्रियजनों को शुभकामना सन्देश  देने के लिए एक से बढ़कर एक आकर्षक ग्रीटिंग कार्ड खरीदने के लिए लोगो की काफी भीड़ उमड़ती थी और दुकानदार भी ग्रीटिंग पर अच्छी  खासी कमाई  कर लेते थे किन्तु मोबाईल एवं कम्पुटर के बढ़ते चलन से ग्रीटिंग की चमक फीकी पड़ने लगी है, हालाकि दिवाली पर्व को देखते हुए शहर  की दुकानों में ग्रीटिंग कार्ड सज गए है किन्तु ग्राहकों की कमी दुकानदारो को खल रही है,
मोबाईल का चलन  इस कदर बढ़ चुका है की लोग मोबाईल के माध्यम से अपने प्रियजनों की हर गतिविधि से वाकिफ हो जाते है और वे अपने प्रियजनों को शुभकामनाये फोन  व एस एम् एस से दे देते है, जिसकी वजह से ग्रीटिंग का चलन अब कम होता जा रहा है.

सिक्को से बन रहे गहने


अखिलेश उपाध्याय / कटनी
रिजर्व बैंक द्वारा एक, दो और पांच रूपये के सिक्के पर्याप्त संख्या में जारी किये जाने के बाद भी अंचल में चिल्लर का संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है. दुकानदारो ने 25 -50 पैसे को तो चलन से बाहर ही कर दिया है. इससे बाजार में सिक्को की खनक कम हो गई है. वही खुल्ले पैसो के अभाव में लोगो को जहा अनचाही वस्तुए अथवा अतिरिक्त सामग्री खरीदना पड़ती है. दुकानदारो द्वारा ग्राहकों के ऊपर इस कीमत का अतिरिक्त सामान लेने का दबाव आने लगा है. इसी तरह फुटकर दुकानदारो ने खुल्ले पैसे की जगह टाफिया  देना आरम्भ कर दिया है. इसके साथ ही कतिपय दुकानदारो, व्यापारियों ने तो सरकार के सामानांतर अपनी निजी मुद्रा बतौर कूपन प्रचलित कर रखी है.  इसी तरह किराना दुकान, सब्जी विक्रेता, चाय और पान के ठेला आदि ने ग्राहकों को खरीददारी के बाद एक या दो रूपये लौटाने के एवज में माचिस, गुटखा, पाउच, टाफी इत्यादि विकल्प तैयार कर रखे है. कतिपय होटल संचालको  ने तो एक या दो रूपये के अपनी होटल के नाम के कूपन जारी कर रखे है. शहर में निजी मुद्रा का सरेआम चलन किया जा रहा है और प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है.

गहनों   में हो रहा उपयोग
सूत्रों के अनुसार कटनी अंचल में सराफा व्यवसाय से जुड़े एवं अन्य लोगो द्वारा सिक्को की कालाबाजारी का काम बड़े ही चालाकी पूर्वक किया जा रहा है. इनका उपयोग वह आभूषण बनाने में कर रहे है. जबकि अन्य प्रदेशो में 25 एवं 50 पैसे के सिक्के आज भी चलन में है. अर्थ व्यथा के नियम के अनुसार प्रत्येक 20 वर्ष में प्रचलित पुराने सिक्को  का मूल्य नए सिक्को से ज्यादा हो जाता है. सिक्के आभूषण और अन्य वस्तुओ के काम आने लगते है. इससे निपटने के लिए आर बी आई  की कोई तैयारी नहीं होती. पुराने सिक्को के बदले नए सिक्के बाजार में जल्दी नहीं लाये गए तो यह समस्या गंभीर रूप ले सकती है.
शहर में सब्जी विक्रेताओं का कहना है की उन्हें अपने धंधे में रेजगारी की मजबूरी के चलते 80 रूपये के बराबर ऐसे सिक्के के लिए 100 रूपये देने पड़ रहे है. वही बेकरी, दवाई व परचून की दुकानों पर ग्राहक कोई सामान खरीदता  है तो दुकानदार उसे 5 रूपये से कम लौटाने को तैयार नहीं होता. वे एक, दो, तीन, चार रूपये के बकाया को सिक्को या नोटों के बदले  चुकाने की बजाय  या तो कोई सामान दे देते है या फिर सामान देने से ही मना कर देते है वही 25 -50 पैसे के बदले में टाफी थमा दी जाती है. शराफा बाजारों के आलावा शहर के अन क्षेत्रो में भी पुराने सिक्को से धातु निकालकर गहने बनाने का काम धड़ल्ले  से जारी है.

100 के सिक्के 180 रूपये में
सराफा बाजार में एक रूपये के सौ सिक्के 165 से 180 रूपये तक में बिक रहे है. इन सिक्को को गलाकर सराफा व्यवसाय से जुड़े लोगो द्वारा पायजेबी, अगूठी और विछिया बनाये जा रहे है. इसका एक प्रमुख कारण यह है की इन सिक्को से निकलने वाला स्टील एवं निकिल उच्च  श्रेणी का होता है. वही इनसे बने आभूशनो की चमक चांदी  के समान ही रहती है. दूसरा प्रमुख कारण पिछले कुछ महीनो से दोनों कीमती धातुओ के भाव में आया जबरदस्त उछाल है. इस वजह से सोने-चाँदी के आभूषण गरीब और मध्यम वर्ग की पहुच से बाहर होते जा रहे है. ऐसे में बढती महगाई के इस ज़माने में यदि कोई चीज सस्ती मिलती है तो आम आदमी उसी ओर जल्दी आकर्षित होता है.

शासन प्रशासन नाकाम
सरकार के लिए छोटी कीमत वाली मुद्रा की व्यस्था काफी कठिन साबित हो रही है. एक  और दो रूपये के कागजी नोटों की छपाई तो सरकार ने लगभग बंद  कर रखी है. इसके दो कारण है एक तो कागजी मुद्रा की उम्र ज्यादा लम्बी नहीं होती, वही महगा कागज और छपाई की लागत अंकित मुद्रा से कई गुना ज्यादा होती है. इस कारण सरकार ने काफी पहले ही एक दो और पांच के नोटों की जगह सिक्को को बढ़ावा देने की नीति अपना ली थी. एक, दो रूपये के सिक्को की किल्लत की वजह इनमे प्रयुक्त धातु का महगा होना है यानि सिक्को को गलाने पर धातु को बेचकर उनके अंकित मूल्य से अधिक कीमत मिल जाती है. सरकारी मुद्रा को जलाना और गलाना  दोनों ही अपराध है पर सरकार इस गोरखधंधे को रोक पाने में अक्षम  है.

करोडो का व्यापार और टेक्स का भुगतान नहीं ......!

अखिलेश उपाध्याय / कटनी
कटनी में करोडो का ड्राई  फ्रूट   का व्यापार होता है. वैध अवैध रूप से हो रहे इस व्यापार पर अभी तक वदिज्य  कर  विभाग की नजर नहीं पड़ रही है. ड्राई फ्रूट पर 6 फीसदी वैट लगता है जबकि इस अनुपात  में कभी भी टेक्स जमा नहीं होता है. इस वित्तीय वर्ष में किसी भी बड़े किराना व्यापारी के यहाँ कोई सर्चिंग भी नहीं हुई.

कटनी से न केवल ड्राई  फ्रूट बल्कि किराना आईटम का करोडो का व्यापार हो रहा है. जानकार सूत्रों की माने तो बगैर इंट्री टेक्स चुकाए हर रोज माल शहर में आ रहा है लेकिन इस पर कोई भी कार्रवाई नहीं होती. इससे सहज रूप से अंदाजा लगाया जा सकता है की शहर का किराना व्यापार किस तरह से हो रहा है.

दिवाली पर व्यापार चरम पर
ठण्ड और दिवाली के मौसम में ड्राई  फ्रूट  का सबसे अधिक व्यापार होता है. इसके अंतर्गत शहर के आलावा आस-पास के कई जिलो में भी यही से ड्राई  फ्रूट की सप्लाई होती है.. वाडिज्य कर विभाग ने अभी तक किसी भी किराना व्यापारी के यहाँ कोई कार्रवाई नहीं की है.

किस पर कितना वैट
वाडिज्य कर विभाग द्वारा ड्राई फ्रूट पर 5 फ़ीसदी वैट, 1 फीसदी इंट्री टेक्स लिया जाता है. इस प्रकार से लगभग 6 फीसदी टेक्स चुकाना पड़ता है.

माल दिल्ली से आता है
शहर में सबसे अधिक माल दिल्ली से ही आता है. मुख्य रूप से ड्राई फ्रूट की ज्यादा पैदावार जम्मू एवं खाड़ी  देशो में होती है. इन स्थानों से दिल्ली के व्यापारी माल मगवाते है और कटनी में सप्लाई करते है. दिल्ली की ओर से आने वाले ट्रक एवं रेलवे द्वारा प्रतिदिन माल शहर में लाया जाता है.