26 November, 2010

घोड़े की सवारी व शहनाई की गूँज हुई महँगी

देवउठनी ग्यारस के कुछ दिनों के बाद ही अब शादी विवाह धूम धाम से होने लगे है लेकिन इस साल शादी में धूम धड़का पिछले वर्ष की अपेक्षा इस बार डेढ़ गुना महगा हो गया है. चाहे शादी में डी जे या बंदबाजो   की बात या खाने-पीने  की या फिर मैरिज धर्मशाला के किराये की.

इस बार महगाई का चारो तरफ बोलबाला है. वर और वधु पक्ष दोनों की जेब पर पिछले दिनों बढ़ी महगाई के कारण अतिरिक्त बोझ बाद  गया है. पिछले कुछ माह से लगातार बढ़  रही महगाई की मार अब उन लोगो को सहन करनी पड़ रही है जिनके बेटा -बेटी की शादी होने जा रही है. वो लोग भी महगाई की मार से पीड़ित दिख रहे है क्योकि शादी विवाह के अवसर पर अपने यार दोस्तों रिश्तेदारों के लिए भोजन का निमंत्रण देते है लेकिन पिछले वर्ष की अपेक्षा  इस बार दावत में उपयोग होने वाली सामग्री के भाव आसमान छू रहे है. शादी समारोह में खाना बनाने वाले हलवाई का कहना है की शक्कर, आटा, दाल, सब्जी आदि महगे दामो पर खरीदना पड़ेगा इसलिए पहले से तय रेट का कोई मतलब नहीं रह गया है.

शादी के कार्ड्स की कीमत इस साल पंद्रह प्रतिशत तक बढ़ी  है. इस बार बाजार में सामान्य श्रेणी में तीन से लेकर साठ रूपये तक के कार्ड उपलब्द्ध है. ग्राहकों की मांग पर भी महगे कार्डो की संख्या में इजाफा हुआ है लेकिन कार्डो की महगाई का असर फ़िलहाल कतई दिखाई नहीं दे रहा है. शादी विवाह के निमंत्रण को देने के लिए मजबूरी में लोगो को कार्डो को छपवाना पड़ रहा है. बगैर कार्ड के  किसी को भी मुह जुबानी दावत देना कुछ लोग अच्छा नहीं समझते है. वही प्रिंटिंग प्रेस के संचालक  संजय तिवारी ने बताया की बढती महगाई से कार्डो में कोई ज्यादा असर नहीं पड़ रहा है बल्कि कुछ लोग हलकी क्वालिटी के कार्ड छपवा रहे है.
लडको की शादी हो और घोड़े और बैंडबाजे न हो तो कुछ अजीब सा लगता है. पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष बैंडबाजो के साथ-साथ घोड़े वालो ने भी बढती महगाई को देखकर अपने भी दाम बढ़ा दिए है जो पहले पाच सौ रूपये से लेकर एक हजार रूपये में होते  थे वे एक से तीन हजार रूपये मात्र दो घंटे   के लिए मनमाने दाम लिए  जा रहे है कीमतों का असर डी जे बैंडो पर भी पड़ा है जहा बैंडबाजे पांच हजार में हा जाया करते  थे आज वह पंद्रह से बीस हजार रूपये में भी नहीं हो रहे है.

दिन प्रतिदिन बढती महगाई ने विवाह समारोह का बजट बिगाड़ दिया है. बैंडबाजो से लेकर घोड़े की सवारी, रोड लाईट, दीजे तक के भाव दिनोदिन बढ़ते जा रहे है. इसके कारण शादी में होने वाले  खर्च  पिछले साल के मुकाबले बीस फीसदी तक बढ़ चुका है. महगाई ने शादी की तैयारियों में जुटे लोगो को बजट बिगड़ दिया है.

तेजी से रफ़्तार पकड़ रहा अंको का खेल

कटनी / शहर में इन दिनों एक साथ सट्टा और सटोरियों की बाढ़  सी आई दिखाई देने लगी है. एक विशेष विभाग की रजामंदी से चल रहे इस अवैध कारोबार से कई घर चौपट  होने की कगार पर पहुच गए है. वही हफ्ते  के चंद लाभ के चलते कुछ तयशुदा लोग और सटोरिये  जमकर माल बनाने में लगे है. पुलिस की निष्क्रियता के चलते पिछले कुछ दिनों से सट्टा कारोबार बढ़ गया है.
रोज दोपहर तीन बजे और पांच बजे शहर के कुछ प्रमुख चौराहे और तय स्थानों पर अचानक लोगो की आवाजाही और हलचल  आजकल सामान्य दिनों  की अपेक्षा अधिक दिखाई देने लगी है आम लोगो की बात छोड़ दे तो इस भीड़ में शामिल सभी की निगाहे अपने मोबाईल और एक विशेष व्यक्ति को खोजती नजर आती है.
और थोड़ी ही देर हाथो की अगुलिया और आख के इशारे से सांकेतिक सूचना प्रदान करते हुए आते एक खास व्यक्ति के गुजर जाने के बाद फिर दो घंटे  के लिए जनजीवन सामान्य हो जाता है और यह क्रम प्रतिदिन सुबह  से लेकर शाम तक चार शिफ्टो में चलता है. जिसमे रात की अपेक्षा दिन में चहल-पहल खासी तादात में रहती है क्योकि इसमें एक बड़ा धडा ग्रामीण क्षेत्रो  से आये लोगो की भागीदारी से भी होता है. और रात्रि  में यह कारोबार अधिकांशतः मोबाईल नेटवर्क के मध्यम से संचालित हो रहा है.
सैया  भये कोतवाल की तर्ज पर सट्टे में लगे सटोरियों और इनके दलालों के मध्यम से यह लाखो का व्यापार खुलेआम बेख़ौफ़ होकर चल रहा है. इस कारोबार से जुड़े सैकड़ो लोगो के तंत्र के अलावा शहर का आम आदमी इस बात को जानता है की कौन से लोग किन स्थानों पर कमीशन पर काम कर रहे है और मातहतो के माध्यम से इसको संचालित करवा रहे है. पुलिस के आला अधिकारी से लेकर अंतिम दर्जे तक के सिपाही भी दिन में वारी-वारी से नगर में गुजरते है लेकिन इस काम में लगे लोग इसकी निगाहों से ओझल रहते  है और इनके गुजरने के दौरान यह लोग  देखने दिखाने के लिए  सामने से दाये-बाये हो जाते है जिसके बदले प्रत्येक शनिवार तय राशी तयशुदा स्थान पर निश्चित व्यक्ति के मध्यम से पहुच जाती है.
अल सवेरे से ही शहर के कुछ तय स्थानों पर इन सटोरियों का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है जो देर रात तक चलता रहता है. वही इस धंधे से जुड़े दलालों और पुलिस के जबानो की सार्वजानिक जुगलबंदी और मित्रता  भी आमजन में जगजाहिर है. सामाजिक बुराई और समाज की रक्षा  के लिए खड़े दोनों पक्षों की यह जुगलबंदी भी आम लोगो की समझ से परे है.

वर्तमान में किसान मालामाल है. पिछले दो माह के आंशिक विश्राम के बाद सट्टा  कारोबार की गाड़ी अब पुनः पटरी पर लौट  आई है. इस काले धंधे में क्षेत्र के किसान भी बढ़ चढ़कर पैसा  लगा रहे है और बर्बाद हो रहे है. आसपास के कई किसान तो सिर्फ सट्टा खेलने के लिए ही रोज शहर पहुचते है और अपनी खून पसीने की गाढ़ी कमाई सटोरियों को सौपकर चलते बनते है.
खाद बीज लेने में किसानो को आ रहा पसीना
कटनी / पिछले तीन सालो से सूखे की मार झेल रहे किसानो की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है. इस समय मंडी में धान लेकर पहुच रहे किसानो को उचित भाव नहीं मिल रहे है. मंडी में धान की जमकर आवक हो रही है और मंडी में धान लेकर आये किसान उचित दाम की आस लगाये हुए है जबकि व्यापारी औने पौने दाम बता रहे है.

दूसरी तरफ किसान बोवनी के लिए खाद बीज जुटाने के लिए जद्दोजह  कर रहे है. मौसम में गर्मी बने रहने  के कारण कई किसानो की बोवनी बर्बाद हो गई उसे दुबारा बोवनी करनी पड़ रही है.
वैसे ही  कृषि विभाग से एक बार बीज मिल पाना कठिन है ऐसे में किसानो को दुबारा बोवनी के लिए बीज  प्राप्त करने के लिए चक्कर लगाने पड़ रहे है. मजबूर किसान कृषि अधिकारियो के पास लाइन लगाये हुए है.

क्षेत्र के किसानो ने दीपावली के समय बोवनी कर दी थी लेकिन मौसम की बेरुखी से चने और गेहू की बोवनी काफी प्रभावित हो रही है. इस कारण कई किसानो को दोबारा बोवनी करने की नौबत आ गई है. अभी चूकी बोवनी का समय चल रहा है इस कारण किसान चाहते है की उन्हें सुलभता से खाद बीज मिल जाए जिससे की बोवनी समय से कर ले लेकिन गोदाम से बीज खाद देने में कोताही की जा रही है, गोदाम प्रभारी नए नए नियम बताकर किसानो को परेशा कर रहे है.

सरकारी गोदामों में खाद का खेल बदस्तूर जारी है इस खेल में स्थानीय व्यपियो से साठ- गाठ के चलते डिमांड लैटर भेजने के बाद हफ्तों खाद नहीं आती और फिर मजबूरन किसान को स्थानीय व्यापारियों से अधिक दाम पर खाद खरीदनी पड़ रही है. फिर जब तक सरकारी खाद आती है तो किसानो की आवश्कताए समाप्त हो चुकी होती है और फिर इस खाद को व्यापारियों को धीरे से सहकारी समिति द्वारा ब्लेक कर दिया जाता है. जिस खाद को इन व्यापारियों द्वारा इन्ही किसानो को फिर से बेच दिया जाता है.

परेशान किसान ने जिला प्रशासन से मांग की है की खाद तथा बीज पर्याप्त मात्र में उपलब्द्ध कराये जाये.

अघोषित कटौती से लोग परेशान


कटनी  /  लगातार हो रही विद्युत् कटौती से रीठीवासी   परेशान है. चौबीस घंटे  में मात्र चार घंटे भी थ्री फेस की बिजली उपलब्द्ध न होने से आटा चक्की, बेल्डिंग मशीन, फोटो कापी, कम्पुटर, स्टूडियो जैसे विद्युत् संचालित यंत्र ठप्प पड़े है. बिजली के अभाव में इलेक्ट्रानिक उपकरण सो पीस बनकर रह गए है,

बिजली के अभाव में नल जल योजना भी ठप्प पड़ी है. गाँव में जल संकट भी गहरा गया है. मजबूरन  महिलाओं को पानी के लिए हेंड पम्पो  का सहारा लेना पड़ रहा है. इन दिनों रवि की फसलो के पलेवा का कार्य चल रहा है लेकिन किसानो को पलेवा के लिए पर्याप्त बिजली नहीं मिलने से विवश होकर  उन्हें डीजल पम्प और जनरेटर लगाकर सोचाई करना पड़ रही है.

एक तरफ किसानो को बिजली देने का दवा किया जा रहा है उनसे अस्थाई कनेक्शन की राशी भी जमा कराई गई है लेकिन सिचाई के लिए  पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही है. आये दिन ट्रांसफार्मर जल जाते है जिससे  कई ग्रामो  में बिजली गुल हो जाती है. शिकायतों का असर विद्युत् वितरण कंपनी के कर्णधारो पर नहीं होता है.

खाद्य पदार्थो में जमकर हो रही मिलावट


कटनी / शहर के कुछ मुनाफाखोर दुकानदारो ने लाभ कमाने के लिए खाद्य पदार्थो में मिलावट के लिए एक से बढ़कर एक विकल्प तैयार कर लिए है. शहर की कुछ दुकानों पर खाद्य पदार्थो में हानिकारक पदार्थ मिलाकर  व्यापारी जमकर लूट रहे है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस समय शक्कर, हल्दी, लौंग, काली मिर्च और यहाँ तक की दूध और खाद्य तेलों के भी सस्ते विकल्प तैयार लिए गए है. मिलावट के तरीके भी अजीबोगरीब है उनके कुछ उदहारण यहाँ प्रस्तुत है -
चावल के चूरे को चीनी में मिलावट के लिए प्रयोग किया जा रहा है. इससे चीनी का वजन बढ़ जाता है वही ग्राहक को शक भी नहीं होता. हालाकि इस मिलावटी चीनी को आप कितनी ही मात्रा में खाद्य पदार्थ  में डाल दीजिये मिठास नहीं आएगी. और तो और बाजार में हर दुकान की शक्कर अलग-अलग मिल रही है. किसी दुकान की शक्कर को कम मात्रा में डाल देने पर भी मिठास आ जाती है तो कही शक्कर की भरपूर मात्रा भी मिठास नहीं ला पाती है. कई बार चाय में शक्कर डालने के बाद छानते समय सफ़ेद चूरा भी मिलावट की कहानी  बया करता है.

इसी प्रकार   चावल में इस समय सफ़ेद रंग के बारीक पत्थर धड़ल्ले  से मिलाये जा रहे है जो की चावल के रंग में मिल जाते है और इन्हें देख पाना बहुत मुश्किल होता है. चावल खाने पर ही इस बात का अहसास होता है की इसमें कंकर है, इन पत्थरो के लगातार सेवन से पथरी और आंत सम्बन्धी रोग होंने की आशंका बढ़ जाती है.
इतना ही नहीं काली मिर्च में पपीते के बीज और लौंग जैसे मसालों में लकड़ी की मिलावट भी की जा रही है. बात यही तक रहती तो भी गनीमत थी लेकिन चिंताजनक बात यह है की कुछ हानिकारक पदार्थो की मिलावट करने से भी दुकानदार नहीं चूक रहे है, इस समय हल्दी में पीली मिटटी , लाल मिर्च में गेरू, दूध में सिंथेटिक पदार्थ, खाद्य तेल में जहरीले रसायनों का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है. यह मिलावटी माल तुरंत तो असर नहीं करता लेकिन यह धीमा जहर मानव स्वास्थ्य को बुरी तरह चौपट कर देता है.
खाद्य  विभाग भी कभी कभार छापामार कार्रवाई कर सेम्पल जब्त करता है. इसी कारण दुकानदारो के हौसले बुलंदियों पर है. वे बेख़ौफ़ होकर मिलावटी माल बेच रहे है.