11 February, 2011

हो सकता है म न रे गा में बदलाव

हो सकता है म न रे गा में बदलाव
पंचायती राज व्यस्था में ग्रामीण जनप्रतिनिधियों विशेषकर सरपंच, सचिव सहित नौकरशाहों के हाथ से आने वाले समय में महात्मा गाँधी  राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना की वर्तमान व्यवस्था  छिनकर उसमे परिवर्तन  आ सकता है. इस सुगबुगाहट से ही सरपंचो तथा नौकरशाहों में से अनेक के माथे में चिता की लकीरे गहराने लगी है.

    बीते  लम्बे समय से म न रे गा में कई प्रकार के भ्रष्टाचार  की खबरे गर्म होती रही है. जिसमे मागने पर काम देने वाली केंद्र की इस योजना को अन्य निर्माण कार्यो की भांति  निर्माण कार्य आधारित योजना को अन्य निर्माण कार्यो की भांति निर्माण कार्य आधारित योजना बनाने का प्रयत्न ज्यादा चर्चाओं में रहा है. हालाकि ऐसा करने के लिए जाब कार्डधारियो  द्वारा जाब मागने आदि की खानापूर्ति भी पूरी करा ली  जाती है. फिर धरातल पर मजदूर की जगह मशीनों से काम कराने व कागजी खानापूर्ति कर लेने की शिकायते दिल्ली स्तर पर पहुचने से इसमें परिवर्तन का आधार बनने  लगा है.
    इसके अलावा मध्यप्रदेश में विधायको को विधायक निधि रुपी मैचिंग ग्रांट के माध्यम से म न रे गा की राशी से काम कराने की छूट मिलने से भाजपा द्वारा इस योजना का अपने पक्ष में राजनीतिक दोहन करना भी उच्च स्तर पर शिकायतों का  केंद्र बना. यहाँ यह भी स्मरणीय है की केंद्र सरकार आधारित इस योजना में सांसदों को मैचिंग ग्रांट के रूप में सांसद निधि देकर काम कारने की छूट नहीं है. शिकायते तो उच्च स्तर पर यहाँ तक भी पहुची  की म न रे गा के कामो में दिन में तो काम मजदूरों से कराये जाते है व रात में मशीनों से काम कराया जाता है.
    अब ऐसी सम्भावना है की केंद्र सरकार जाब देने आधारित  इस योजना को अब पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप अर्थात पीपीपी के तहत लाने की तैयारी कर रही है. जिससे म न रे गा में घपले रोके न भी जा सके पर इसकी सम्भावना को कम तो किया जा सके. इसके लिए देश  में लागू की जा रही नई व्यस्था यू आई दी (यूनिक अईदेंत्फिकेशन नंबर) के आधार पर निजी क्षेत्र को प्रवेश कराया  जा सकता है. एक मोटा अनुमान है की इस नई संभावित व्यस्था पर शासन 2500 करोड़  रूपये से अधिक इस संभावना पर व्यय करेगी की नई व्यस्था से सरकार को 6000 करोड़ से अधिक की राशी की बचत हो सकेगी.
    कुछ ऐसी योजना बन रही है की नई व्यस्था के तहत बायोमीत्रिक्स आधारित यूनिक आइदेंतिफिकेशन नंबर प्रडाली लागू की जायेगे. जिसमे हाजिरी से लेकर काम का ब्यौरा, मस्टर रोल, जाब कार्ड्स के साथ भुगतान, मजदूर की उंगलियों के निशान के आधार पर ही होगा. इसके लिए बायोमीत्रिक्स मशीने लगाकर इन कार्यो के लिए  सम्बंधित कंपनी कर्मचारी तैनात करेगी. इन्ही सब कामो पर 2500 करोड़ रूपये से अधिक देश में व्यय आने की सम्भावना है.
    नयी संभावित व्यस्था में मजदूर के भुगतान पंजीकरण पर 75 रूपये, आधार जारी करने पर 35 रूपये, प्रत्येक  हाजिरी पर सवा रूपये तथा मजदूरों के लेन देन पर 25 पैसे सम्बंधित कंपनी को मिल सकेगे.
    हालाकि वर्तमान व्यस्था पूरी तरह या काफी हद तक बेहतर हो सही भी नहीं माना जा सकता. इसलिए व्यस्था को बेहतर बनाने के लिए उसमे सुधार की प्रक्रिया निरंतर चलती रहनी कहिये. इस द्रष्टि से म न रे गा में भुगतान  व्यस्था में परिवर्तन पर विचार अथवा कार्रवाई का आमतौर पर स्वागत किया जा रहा है. हा ऐसे संभावित परिवर्तन की सुगबुगाहट  के बाद इस योजना में लिप्त नौकरशाही तथा  सरपंचो में से कुछ जरूर चिंतिति हो उठे है. क्योकि नई व्यस्था में रास्ता निकलने व इससे पहले समझने में कितना समय लगता है नौकरशाह उतना ही एक स्थान  पर रुक पाते है. वही सरपंचो का कार्यकाल यही समझने तक समाप्ति पर आने लगता है. इसके चलते कही चिंता तो कही प्रसन्नता का वातावरण व्याप्त होने लगा है.
    वर्तमान व्यस्था में बैंक तथा डाकखानो में जाब कार्डधारियो के खाते खुले रहते है. यह भुगतान आम तौर पर इन खातो के माध्यम से ही होता है. परन्तु इन खातो में सब कुछ शत प्रतिशत सही होता हो इसका दावा कोई नहीं करता. इसी का कारण है की शिकायते प्रकाश में आने के बाद खाते से भुगतान व्यस्था में भी बदलाव पर विचार किया जा रहा है.
    सूत्रों  की माने तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की इस योजना के प्रति रूचि देखते हुए आगामी बजट में देशभर  के लिए म न रे गा पर 64 हजार करोड़ रूपये व्यय प्रस्तावित किया जा सकता है. जिसमे से 2500 करोड़ रूपये का व्यय इस नई व्यस्था पर प्रस्तावित किया जा सकता है. उल्लेखनीय है की इस वितीय वर्ष में देश भर में म न रे गा पर 41 हजार करोड़ रूपये व्यय होने का अनुमान है. वही देश भर के आकड़ो  को देखे तो म न रे गा में 11 करोड़ से अधिक मजदूर कार्यरत है जो संख्यात्मक आकड़ो के मुताबिक कई गुना अधिक हाजिरी देते है.
    शासन यदि नई व्यस्था लागू करना  ही चाहता है तो उसे इस कार्य में समाजसेवी संस्थाओं को योगदान लेना चाहिए क्योकि कंपनियों के उद्देश्य लाभ कमाने तक सीमित रहते है इससे म न रे गा की आत्मा पर ही चोट पहुच सकती है.