04 March, 2011

जहा कोई आनंद नहीं उसमे लोग फस रहे है

मुहास / रीठी

ईश्वर के बारे में ऐसी-ऐसी कल्पनाये मनुष्य ने बना राखी है उसकी पहचान ही उलटी पड़ गयी है. इसलिए अपनी बनाई हुई उलटी पहचान के कारण तुम सामने वाले ईश्वर को नहीं पहचानते.
ईश्वर सर्वरूप से प्रगट हो रहा है. गीता में कहा  है - 
यदादित्यगतं तेजो-हमारी सम्पूर्ण इन्द्रियों में विषयों के प्रकाशन का जो सामर्थ्य है और याच्चन्द्र्मासी-हमारे मन में संकल्प विकल्प करने का जो सामर्थ्य है, यच्चाग्नौ-हमारी वाणी में बोलने का जो सामर्थ्य है-कौन है वह? वही ईश्वर है-तत्तेजो विद्धि मामकं-वही आकर देख रहा है, वही बोल रहा है वही सोच रहा है. उसके सिवाय तो मिटटी भी नहीं, पानी भी नहीं , आग भी नहीं, हवा भी नहीं, आकाश भी नहीं, मन भी नहीं.
वृन्दावन धाम से पधारे अष्टादस पुराण प्रवक्ता आचार्य व्रज्पाल शुक्ल द्वारा मुहस में चल रहे अति लघु रूद्र यग्य में अपने सारगर्भित प्रवचन में भाग्वात्तत्व को प्रतिपादित करने के द्रशंत रूप में यह उदगार व्यक्त किये . मुहास में इस यग्य में  अठारह पुराणों के पाठ का पारायण किया गया और साथ ही देश भर से पधारे  कई विद्वानों के द्वारा विविध ग्रंथो पर प्रवचन किये गए. 
शुक्रवार को हनुमान जी के चरित्र का वर्णन सुन्दरकाण्ड के अनुसार करते हुए आचार्य व्रज्पाल शुक्ल जी ने कहा की मनुष्य   शरीर प्राप्त करके बुद्धि प्राप्त करके, सत्संग प्राप्त करके ईश्वर को न पाना यह नशे में आ जाना है. इसका नाम प्रमाद है. रात बीत गयी, दिन बीत गया, जिन्दगी बीत रही है, छड-छड छीज रहा है और ईश्वर के सामने होते हुए भी हम ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते. वह पूर्ण अविनाशी जीवन, वह चेतन सच्चा ज्ञान सच्चा प्रकाश, वह आनंद जिसमे दुःख का लेश नहीं है-उसका समुद्र उमड़ रहा है. 
आनद सिन्धु मध्य तव वासा, बिनु जाने तू मरत पियासा. 
गोस्वामी तुलसीदास कहते है तुम आनंद के समुद्र में रह रहे हो लेकिन बिना जाने प्यासे मर रहे हो.
दुःख तो इस बात का है की परमात्मा के आनंद समुद्र में सारी स्रष्टि डूब और उतरा रही है लेकिन न तो कोई उस रस को पीता है और न तो आख भरकर देखता  है और आश्चर्य यह है की ऊपर-ऊपर उतराने  वाली मरू मरीचिका के जल के सामान झूठी जो दुनिया है, जिसकी कोई सत्ता, महता नहीं कोई प्रकाश नै कोई आनंद नहीं उसमे लोग फस रहे है.