26 August, 2011

कागजो में चल रहे मनारेगा के काम

  इस योजना को लेकर सरकार की गैरजिम्मेदारी हमेशा झलक आती है। इसी के चलते इस मद से सौ करोड रूपये इस वित्त वर्ष में कम कर दिए गए। अब कम आवंटन से बढी हुई जरूरते कैसे पूरी होंगी यह समझ से परे है। भारत का कायाकल्प करने में सक्षम इस योजना को लेकर सरकार गंभीर नहीं दिखती। 
  भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस योजना से बेहतर शायद ही कोई योजना हो बल्कि पूरी दुनिया में शायद इस जैसी कोई योजना हो ? यह अगर ठीक से संचालित हो तो गरीबी मिटाने का महात्मा गांधी का सपना पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन योजना का दुखदायी पहलू  यह हक् कि यह कागजी तौर पर तो पूरी तरह सफल है लेकिन वास्तविक तौर पर नहीं। अभी देश के कई जिले ऐसे हैं जहां इस योजना से जुडी घोर अनियमितताएं सामने आ रही है। 
  खासकर लोग इसे अपनी अर्थव्यवस्था  में मजबूती लाने के उपाय की तरह देख रहे हैं लेकिन कई ऐसे भी हैं जिनका प्रयास है कि इसे पूरी तरह पंगु बना दिया जाए। ऐसा देखा गया है कि योजना में भृष्टाचार को सामनू लाने वाले कुछ जुझारू कार्यकर्ताओं की हत्या तक हुई ओर हत्यारों को पकडा भी नहीं जा सका।
  इस वित्त वर्ष में इसके लिए भले ही कम राशि का प्रावधान हो, फिर भी इसके लिए तय राशि ईमानदारी से खर्च की जाए तो हालात बदल सकते हैं। बस्तुतः योजना को ओर राशि की तो जरूरत है लेकिन इससे कही। अधिक जरूरी पारदर्शिता से इसके प्रावधानों को लागू करने की है। योजना को सुधारने के लिए सबसे जरूरी एक मजबूत शिकायत निवारण मशीनरी की स्थापना की है। 
  मौजूदा स्थिति में केन्द्र और राज्य सरकार इसके जवाबदेही संबंधी प्रावधानों को महत्व नहीं दे रही हैं। योजना बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी से रहात दिलाने में तभी कारगर हो सकती है जब इस पर अमल ठीक से हो और किसी किस्म की लापरवाही पाए जाने पर जुर्माने ओर दण्डित किए जाने जैसी व्यवस्था भी सुनिश्चित हो। अभी केवल गिने-चुने मामलों में ही जुर्माना तय किया गया है जबकि अनियमितता एवं लापरवाही के मामलों का अंबार लगा है। 
  मजदूरी के भुगतान में बिलंब पर मुआवजे का प्रावधान भले हो लेकिन इसका उल्लंघन खुद राज्य सरकारें कर रही है। नौकरशाह तो मनरेगा की  चाबी अपने हाथ में रखना चाहते हैं जो इस योजना  की मूल मंशा के ही खिलाफ है। योजना में कई सकारात्मक बातें निहित हैं किंतु इसे भ्रष्टाचार ओर अनियमितताओं से बचाए रचाना होगा। इस योजना से भ्रष्टाचार को दूर किया जा सके इसके लिए इसमें सारे प्रावधान हैं। बस इसे ठीक से लागू किया जाना चाहिए। किसी भी किस्म की अनियमितता पर कडी कार्रवाई होनी चाहिए।
  कामगारों के जाब कार्ड और उन्हें मिल रही मजदूरी की समय-समय पर जांच हो। समाज के जिस वर्ग के लिए यह योजना शुरू की गई थी, उसे इसका लाभ मिलना चाहिए। लोागों को अभी योजना की पूरी जानकारी ही नहीं है। वे नहीं जानते कि जाब कार्ड में नाम कैसे दर्ज कराए जाएं। तहसीलदार व सचिव तक पूरी जानकारी से अनभिज्ञ हैं। स्थिति बदलनी होगी। आखिर किसी भी अन्य विकास योजना की तरह इसका सबसे बडा दुश्मन भ्रष्टाचार ही है, इसे समझना होगा। केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी केवल योजना के संबंध में घोषणाएं करने की ही नहीं है बल्कि जमीनी तौर पर नियमों का कितना पालन हो रहा है, यह भी देखने की बात  है।