28 September, 2011

पंचायती राज व्यस्था के असफल होने का जीता जागता उदहारण

जब बाराती   कोल जनपद पंचायत सदस्य रीठी के रैपुरा से दो वर्षो पूर्व चुना  गया  तो उसे बड़ी उम्मीदे  थी की अब वह अपना  तथा अपने क्षेत्र की तस्वीर बदल देगा. अभी साइकिल पंचर की दूकान चलाकर अपना उदर-पोषण कर रहे बाराती कोल को अब अपने क्षेत्र में अपने मतदाताओं से किये गए वादे निभा पाना बड़ा कठिन है.
मुंडी बाई 

मुंडी बाई का घर एवं बच्चे 

बाराती कोल अपने घर में 

मुंडी बाई  का घर 
दूसरी बार  जनपद सदस्य बनने के बाद बाराती को क्षेत्र के लोगो ने फूल माला  पहनाकर स्वागत किया था और उसे रीठी  से अपने गाँव तक लेकर आये थे.


सदस्य बनने के बाद वह प्रतिदिन रीठी जनपद कार्यालय जो उसके घर से बीस किलोमीटर दूर है जाता था और अपने क्षेत्र में विकास के लिए जनपद सी ई ओ से गिडगिडाता  रहा.


उसने जनपद में होने वाली सभी मीटिंग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जो की जनपद सी ई ओ रीठी ने ली. बाराती ने बताया की मैंने अपने क्षेत्र के लोगो की मागो के लिए जनपद से लेकर जिला सी ई ओ तथा कलेक्टर तक दौड़ लगाईं लेकिन कोई फायदा न हुआ.


बाराती कोल अपनी साईकिल दुकान पर 
लगातार दो वर्षो से इस क्षेत्र से जनपद सदस्य चुनने के बाद इस आदिवासी सदस्य को दुःख है की वह अपने क्षेत्र में आज तक कोई काम न करा सका. जबकि बाराती को जनपद सदस्य बनने के बाद केवल बारह सौ रूपये का मासिक मानदेय मिलता है जिसे वह  जनता की सभी समस्याओं के लिए जनपद से लेकर जिला तक दौड़ लगाने में खर्च कर देता है . लेकिन वह कहता है की रीठी  जनपद जाने का मतलब सौ रूपये का खर्च बस के किराए  और चाय नाश्ते में ही खर्च हो जाता है.

पंचर सुधारते हु बाराती 
अपने खपरैल घर में रहे रहे बाराती कोल को अब पंचायती राज व्यवस्था से मोह भंग हो चूका है . दो बच्चो के पिता ने बताया की वह प्रतिदिन सौ रूपये अपनी साइकिल पंचर की दूकान से अपने परिवार के उदर पोषण के लिए कमा  लेता है.

अपने चुनाव जीतने के लिए बाराती ने अपने रिश्तेदारों से कर्ज लिया था जिसे वह आज तक चूका  रहा है. जब लोग उससे क्षेत्र में विकास कराने की बात करते है तो वह कहता है की आप जनपद सी ई ओ से  संपर्क करे जो अपनी मन मर्जी से काम करने के लिए जाने जाते है और उनकी कोई बात नहीं सुनते है .

आज सबको पता है की पंचायती राज सिस्टम एक छलावा है, बराती ने कहा, यह तो केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए है जो हर एक काम सेंक्सन करने के लिए कमीशन लेते है. इनका फिक्स कमीशन होता है बगैर कमीशन के कोई काम ही नहीं होते.

बाराती ने बताया की वह अपनी दो एकड़ खेती से घर चलाता है और अपने मतदाताओ से संपर्क में रहता है क्योकि उसके अधिकांस मतदाता साइकिल का प्रयोग करते है.

इसी प्रकार मुंडी बाई कोल जो की बाराती  के साथ ही जनपद सदस्य चुनी गयी अब वह भी इस तंत्र से तंग आ चुकी है. आदिवासी महिला इन दिनों रैपुरा के पास बनने वाली एक चिमनी फेक्टरी में दिहाड़ी का काम कर रही है मुंडी को लगता है की वह जनपद की कोई भी मीटिंग में न जाए क्योकि इन मीटिंग का कोई भी अर्थ नहीं निकलता है.

मुंडी बाई ने बताया की उसके पास स्वयं का घर भी नहीं है और न ही खेती है. मुंडीबाई ने बताया की  यदि मै और मेरा पति एक  हफ्ता तक काम न करे तो फिर हमें रोटी के लाले पड़ जाते है. मुंडी बाई का पति कटनी में मिस्त्री  के रूप में मजदूरी करता है.  कमाल की बात तो यह है  इस जनपद सदस्य का आज तक बी पी एल का कार्ड भी नहीं बनाया गया जबकि उसने कई बार आवेदन दिया.

बाराती की तरह मुंडी बाई भी अपने जनपद सदस्य के पद से संतुष्ट नहीं है. मुंडी बाई ने कहा की मै पंचायती राज व्यस्था के जमीनी स्तर पर असफल होने का जीता जागता उदहारण हूँ .