07 September, 2011

कागजों में अटके सीसीटीवी कैमरे


 आतंकियों के निशाने पर चल रहे दिल्ली उच्च न्यायालय में आखिर कब सीसीटीवी कैमरे लगेंगे यह सोचनीय विषय है। हैरानी वाली बात यह है कि तीन वर्षो में इस काम की कागजी प्रक्रिया तक पूरी नहीं हो पाई है, जबकि तीन महीने में इस कार्य के लिए टेंडर डालने की प्रक्रिया पूरी करनी थी। 

    कहना गलत न होगा कि आज अगर सीसीटीवी कैमरे लगे होते तो दहशतगर्द बुधवार को धमाका करने की न सोचते और अगर करते भी तो जांच एजेंसियां आसानी से उनके गिरेबां तक पहुंच जातीं। कुछ ऐसी ही बात 25 मई को उठी थी जब हाईकोर्ट गेट के बाहर बम धमाका हुआ था।

     पूरे मामले पर नजर डालें तो लगभग तीन वर्ष पहले दिल्ली हाईकोर्ट परिसर व उसके विभिन्न गेटों पर 32 सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना पर काम शुरू हुआ था। विभागीय सूत्रों का कहना है कि कैमरे लगाने वाली कंपनियों के आपसी विवाद के चलते कैमरों के दामों पर सहमति नहीं बन पाई और तीन बार टेंडर निरस्त किए गए। 

    25 मई 2011 बम धमाके के बाद सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना में फिर तेजी आई लेकिन जून में दिल्ली पुलिस ने इस योजना पर काम कर रहे लोक निर्माण विभाग को बताया कि 32 की जगह 49 कैमरे लगाने की जरूरत है, जिस पर फिर नए सिरे से योजना पर काम शुरू हुआ। अब इस योजना पर लगभग 60 लाख रुपये का खर्च आने का अनुमान है। 
इस बाबत लोक निर्माण विभाग के निदेशक (कार्य)  कहते हैं कि सीसीटीवी कैमरे के लिए जून में टेंडर प्रक्रिया का काम पूरा हो गया था। मगर दिल्ली पुलिस ने 17 अतिरिक्त कैमरे लगाने की मांग रखी। जिस पर पूरी योजना पर नए सिरे से काम करना पड़ा है। योजना के अब फिर से टेंडर कॉल किए गए हैं। टेंडर की प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी चुकी है। नौ सितंबर को इसकी तकनीकी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

     दिल्ली बार काउंसिल के चेयरमैन का कहना है कि हमने हाईकोर्ट परिसर के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगाने की मांग की थी परंतु अब तक दिल्ली पुलिस ने कुछ नहीं किया। उन्होने कहा कि हाईकोर्ट के बाहर और अंदर सुरक्षा देना पुलिस की जिम्मेदारी है। अगर गेट के पास ब्लास्ट हुआ है तो उसे भी हाईकोर्ट पर हुआ ब्लास्ट ही माना जाएगा। ऐसे में पुलिस यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती है कि बाहर के हिस्से पर पुलिस का नियंत्रण नहीं है