17 January, 2011

शिवराज की बहने और भांजी अब अस्पताल में सुरक्षित नहीं

शिवराज सरकार  एक ओर संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के लिए जननी सुरक्षा योजना, लाडली लक्ष्मी योजना एवं प्रोत्साहन राशी देकर लोगो का शासकीय अस्पतालों से जो मोह भंग हुआ है उस विशवास को दुबार कायम करने की कोशिस कर रही है लेकिन  ऐसा लगता है की शिवराज की बहने और भांजी  अब अस्पताल में सुरक्षित नहीं है क्योकि सरकारी कर्मचारी की अंतरात्मा म़र चुकी है. उनमे संवेदनाये बची ही नहीं है.

इसी प्रकार का एक दर्दनाक हादसा सोमवार को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रीठी में घटित हुआ जब ग्राम पंचायत करहिया नंबर एक की आदिवासी  महिला की नवजात बच्ची को अस्पताल के प्रसूति वार्ड में एक बिलौटे ने बुरी तरह लहू लुहान कर दिया.

गोरी बाई आदिवासी पति सुरेश सुरक्षित प्रसव के लिए सामुदायिक स्वस्थ्य केंद्र रीठी में भर्ती हुई. रविवार को उसने एक स्वस्थ बच्ची  को जन्म दिया. सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन सोमवार की शाम लगभग चार बजे  एक बिलौटे ने बच्ची  को बुरी तरह जख्मी कर दिया जिसमे उसकी दाई आँख पर पंजा मारा और उसका दाया गाल  और आँख बुरी से प्रभावित हो गए.

इस हादसे के बाद से जननी गोरीबाई रोटी बिलखती रही लेकिन इस अबला माँ की पुकार सुनाने वाला कोई नहीं था. चीख पुकार सुनकर अस्पताल के कर्मचारी बिलौटे को पकड़ने में लग गए जबकि इस घायल नवजात को बचाने में कोई भी नहीं आया.

मीडिया की दखलंदाजी के अस्पताल प्रबंधन हरकत में आया.
इस ह्रदय विदारक घटना से रीठी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसूति वार्ड में उपस्थित माताओं के कलेजे मुह को आ गए. वहा  उपस्थित जननियो ने बताया की दिन भर बिलौटा चक्कर लगाता रहता है  और इस अव्यवस्था के लिए अस्पताल प्रबधन जिम्मेदार है. वार्ड बॉय, स्वीपर, चोकीदार, स्टाफ नर्स कोई भी अपनी ड्यूटी पर नहीं मिलता.

 पूरे अस्पताल में एक मात्र नर्स को छोड़कर कोई भी नहीं मिला. जननी वार्ड में महिलाओं ने कहा की बगैर किसी व्यवस्था  के उनको तीन दिन तक इस अस्पताल में भर्ती रखा जाता है. इससे अच्छा  हो की उनको एक दिन बाद ही इस नरक से छुट्टी मिल जाए.

ड्यूटी पर मिली नर्स से जब उसका नाम पूछा तो बड़े ही अभद्र लहजे में उसने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया. उसने कहा की आपको नाम से क्या करना आप तो स्टाफ नर्स ही लिख देना. बाद में अपने कमरे में आराम फरमा  रहे बी एम् ओ डाक्टर गुलाब तिवारी ने बताया की बच्चे की आँख पर मामूली घाव है फिर भी तीन दिन तक आब्जर्वेसन पर रखा है उसके बाद ही कुछ कह सकते है.

अस्पतालों में व्याप्त  अराजकता का यह जीता जागता उदहारण है. ड्यूटी पर तैनात नर्ष शोभना अपना नाम नहीं बताना चाहती अस्पताल के कर्मचारियों के होसले इसलिए  भी बुलंद रहते है क्योकि सी एम् ओ और जनप्रतिनिधियों को  महीने का कमीशन लेकन सारी अव्यवस्थाओ को अनदेखी कर देते है.
ऐसा नहीं है की यह रीठी अस्पताल में कोई पहली घटना है अभी पंद्रह बीस दिनों  पहले ही एक और नवजात पर बिल्ली हमला कर चुकी है फिर भी अस्पताल प्रबंधन अपनी कुम्भ्करनी नीद से नहीं जगा.
क्या अस्पताल प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेगा और ऐसे दरवाजे लगवाये जायेगे जो खोलने पर स्वतः ही बंद हो जाते है? खिड़की दरवाजो पर मजबूत जाली लगाई जायेगी ?
दरवाजे पर स्टाफ का कोई जिम्मेदार कर्मचारी तैनात रहेगे?

या फिर अपने बच्चे की जान गवाने के लिए गरीब माताए अपने नौनिहालों को इसी तरह कुत्ते बिल्ली से नोचते हुए देखकर भी चुप रहेगे ?
क्या अस्पताल के कर्मचारी बाहर बैठकर इसी तरह ठहाके लगते हुए चाय की चुस्की का आनंद लेकर अपनी ड्यूटी पूरी करते रहेगे?
कभी इन पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी ?

मरीजो की जान जोखिम में

कटनी
घरेलू गैस की कमी से आम भारतीय तो लगभग वर्ष भर ही जूझता रहता है लेकिन ठंडी के मौसम में परेशानी कुछ अधिक ही बढ़ जाती है. इसका कारण  शादी समारोह सहित नाश्ते की दुकानों पर एल पी जी  सिलेंडरो की खपत बढ़ना है. लेकिन इन दिनों रोगियों के लिए लगे एम्बुलेंस वाहन में भी बेधड़क इन एल पी जी गैस  सिलिंडरो का उपयोग हो रहा है
जिले में सर्दी का मौसम आते ही आम नागरिको की मुश्किलें बढ़ जाती है. एक तरफ महगाई की मार तो दूसरी तरफ गैस एजेंसियों द्वारा उपभोक्ताओं को एक-एक महीने  बाद गैस सिलेंडर उपलब्द्ध हो रही है जिससे  आम आदमी तो बिलकुल पिसा जा रहा है.

ऐसा नहीं है की प्रशासन को इस बात की खबर न हो प्रशासन द्वारा इस विसंगति को रोकने के लिए अभियान भी छेड़ा जाता है लेकिन गैस की कालाबाजारी में मिलने वाले मोटे कमीशन  के कारण गैस का अवैध कारोबार रुक  नहीं सका है. प्रशासन को लाभ इस हद तक पहुचा दिया जाता है की अभी तक तो लाल सिलेंडर चार पहिये के वाहन एवं होटलों में इस्तेमाल किये जा रहे थे लेकिन अब एम्बुलेंस में भी इन खतरनाक सिलिंडरो का उपयोग किया जाने लगा है. मरीजो की जान जोखिम में ड़ाल एम्बुलेंस संचालको द्वारा घरेलू गैस से एम्बुलेंस का सञ्चालन हो रहा है.

यह एक सामान्य सी  बात है की एम्बुलेंस को देख  तत्काल अस्पताल पहुचाने के लिए इस वाहन को कोई भी कही पर नहीं रोकता और बिना किसी रोक-टोक के एम्बुलेंस को जाने दिया जाता है.

अब तक स्कूल वैन एवं टेक्सियो में एल पी जी  सिलिंडरो का उपयोग किया जा रहा था और ऐसा करके वाहन मालिक मोटा  मुनाफा कमा रहे थे. अपने साथियो के मोटे मुनाफे को देखते हुए एम्बुलेंस चालाक भी ऐसा करने लगे है. घरेलू गैस पेट्रोल एवं डीजल से सस्ती पड़ती है, इसलिए एम्बुलेंस चालाक इसका इस्तेमाल कर रहे है.

जबकि एल पी जी गैस सिलिंडरो से संचालित हो रही एम्बुलेंस में जाना मरीजो के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. इस गैस से चलने वाले वाहनों में गर्मी अधिक रहती है, साथ ही गैस लीक होने का खतरा भी बना रहता है. यदि कही धोके से गैस लीक होती है तो मरीज को सास लेने में तकलीफ आ सकती है और ऐसी विषम परिस्थिति में मरीज असहाय एक और गंभीर हादसे का शिकार कभी भी हो सकता है.