08 September, 2011

धमाके पर धमाके.


 देश का ऐसा कोई भाग नहीं जहा के लोग महफूज हो ...  और हमारी सरकार घायल और मरने वाले के परिवारवालों को मुआवजा देकर अपनी जवावदेही से मुक्त हो जाती है  और  फिर देश के गृह मंत्री और प्रधानमंत्री का रटारटाया बयान देता है ... जांच टीका गठन... और जांच कब और क्या आती है यह देश की जनता को नहीं बताया जाता या बताया भी जाता है तब तक लोग दाल-रोटी के चक्कर में सब कुछ भूल जाते है...

समाचार चेनलो और अखबारों में तीन चार  दिन की खबर... फिर सब ज्यो का त्यों चलने लगता है ... हमारे देश की सरकार को आम नागरिको  की बिलकुल  भी चिंता  नहीं है तभी तो उसे इस कामन मेन की जरा भी फ़िक्र नहीं है और सरकार की सेहत पर जरा सा भी फर्क नहीं पड़ता...

घायलों को अस्पताल देखने लाल बाती में देश के मंत्री नाटक करने क्यों पहुचते है? और इससे उस मरीज के परिजन ही परेशानी में पड़ जाते है जिन्हें घायल की तीमारदारी भी नहीं करने दी जाती....क्या मुआवजा और नकली दुःख व्यक्त करने से मृतक के परिवारवालों का दुःख बाटा जा सकता है...?
अखबारों में बड़े-बड़े लेख, टेलीविसन पर मातमी धुन, सोसल साईट्स फेसबुक, ट्विट्टर और आर्कुट पर अपनी संवेदना जताने तथा मोमबत्तिय   जलाने से क्या पीड़ित के परिवार का दुःख कम किया जा सकता है...
आज हमारी संवेदनाये मर गयी है. आज जो दुःख किसी मृतक के परिजनों पर आया है कल हम पर भी आ सकता है. इस देश में हम भी सुरक्षित नहीं है...

और हमारे नेता इसमें भी अपनी राजनैतिक रोटिय सेकते नजर आते है. विपक्ष को मौका मिल जाता है सरकार को घेरने का...
क्या कभी देश में हुए आतंकी हमले या धमाके का समाधान निकला है...? और अगर धोखे से कोई उग्रवादी पकड़ा भी जाता है तो क्या देश की जनता के खून की होली खेलने वालो को कभी सजा मिली और मिली भी तो कब और कितनी...?

देश की जनता कब तक और ऐसे धमाके झेलेगी ...? क्या भारतीयों की जान की कोई कीमत नहीं है जो चाहे जब भाजी मूली की तरह काट दिए जाते है.... आखिर यह कभी रुकेगा...?