23 December, 2011

अ हरिजन आदिवासी छात्रावासों के हाल-बेहाल
कटनी । जिले के बतीस अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति छात्रावासों में स्थिति दिनों दिन बद् से बद्तर होती जा रही। इन छात्रावासों में रहने वाले छात्र छात्राओं को न तो भरपेट भोजन मिलता है न ही उनकी अन्य सुविधाओं का
ध्यान रखा जाता है। छात्रावासों में छात्र छात्राओं की फर्जी उपस्थिति दर्शाकर शासन से मिलने वाले बजट में हेराफेरी की जाती है। इन छात्रावासों में रहने वाले छात्र-छात्राओं के अभिभावकों ने आदिम जाति कल्याण विभाग के उच्चाधिकारियों तथा शिक्षा विभाग के अधिकारियों से इन छात्रावासों की जांच किये जाने की मांग की है।

एक जानकारी में बताया गया कि बहोरीबंद तहसील के अंतर्गत स्लीमनाबाद में कस्तूरबा गांधी छात्रावास संचालित है। जो केवल छात्राओं के लिये है इसके अलावा बाकल में बालिका छात्रावास है जिसका संचालन सर्वशिक्षा अभियान के तहत किया जाता है। बहोरीबंद तहसील मु यालय में कन्या छात्रावास है खण्डस्तरीय इस छात्रावास का संचालन राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा
अभियान के तहत किया जाता है बहोरीबंद में ही अनुसूचित जाति छात्रावास, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास एवं अनुसूचित जाति जनजाति बालिका छात्रावास भी संचालित है। कूडऩ एवं बचैया में भी छात्रावास संचालित है इन सभी छात्रावासों में कमोबेश एक जैसी स्थिति है। जानकारी में बताया गया कि इन छात्रावासों में रहने वाले छात्र-छात्राओं भोजन के लिये 750 रूपये मासिक प्रत्येक छात्र-छात्रा के हिसाब से राशि प्रदान की जाती है। इसकी आधी राशि भोजन में खर्च नहीं की
जाती। रोटी तो कभी कभी नसीब होती है दाल एवं स जी भी अत्यंत घटिया स्तर की रहती है। छात्र-छात्राओं द्वारा इसकी शिकायत किये जाने पर उन्हें छात्रावास से बाहर कर देने की धमकी दी जाती है।

इसी तरह रिती तहसील के जालासुर आदिवासी आश्रम शाला की हालत भी बड़ी दयनीय है. यहाँ पचास सीटर छात्रावास में पांच आलू दो प्याज की सब्जी banaayee जा रही थी.नीची के chitr में पचास सीटर हास्टल के नज़ारे आप स्वयं देख सलते है



भोजन के अलावा छात्र छात्राओं को तेल, साबुन, चाय-नाश्ता, आदि के लिये अलग से राशि प्रदान की जाती है। यहां एक साबुन का उपयोग पूरे छात्रावास के छात्र-छात्राओं को करना पड़ता है। शिकायत में यह भी बताया गया कि छात्रावासों में प्राय: आसपास के ग्रामों में रहने वाले बच्चों को रखा जाता है। दूरदराज के ग्रामीण अंचलों से आने वाले बच्चों को यहां प्रवेश नहीं दिया जाता। आस-पास के ग्रामों के बच्चों को छात्रावासों में रखे जाने के पीछे मंशा यही रहती है कि अधिकांश छात्र शाला के बाद अपने घरों में चले जाते है। प्राय: शनिवार को सभी छात्र अपने घर चले जाते है जो सोमवार को वापस आते है। छात्रावासों के संचालन एवं व्यवस्था की जि मेदारी वार्डन, चौकीदार, pradhaan रसोईया एवं सहायक रसोईया आदि की होती है पर इनके द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया जाता। छात्रावास में जितने छात्र-छात्राऐं उपस्थित रहते है। उनसे कहीं अधिक की उपस्थिति दर्ज कर हिसाब किताब में हेराफेरी की जाती है। उच्च अधिकारियों द्वारा यहां मॉनीटरिंग के लिये मॉनीटरों की niyuktee की गई है पर वे कभी यहां जांच पड़ताल के लिये नहीं आते। कभी कोई जांच हुई भी तो वह मात्र दिखावे की कार्यवाही रहती है। छात्र छात्राओं के अभिभावकों ने जिला कले टर समेत आदिम जाति कल्याण विभाग के जिला संयोजक एवं जिला शिक्षा अधिकारी से इन छात्रावासों में व्याप्त अनियमि ाओं की जांच किये जाने तथा दोषियों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही किये जाने की मांग की गई