06 February, 2012

भगवान का चरित्र तो एक औषधि है,

कटनी। भगवान का चरित्र तो एक औषधि है, जन्म मरण
से छुड़ाने वाली औषधि है। वह कोई लालची वैद्य की
बनाई औषधि नहीं है योंकि लालची वैद्य तो रोग को
लंबा कर देते हैं। किंतु यह औषधि ऐसी है कि इससे गुणों
को बड़े-बड़े तृष्णा रहित भक्त पुरूष भगवान की समीपता
का अनुभव करते हुए रस ले लेकर गाते रहते हैं। परीक्षित
ने शुकदेवजी से पूछा कि जब मैं अपनी माता के गर्भ में
था तब अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से मेरा शरीर जल गया था।
उस समय मेरे मन में कोई भाव नहीं था। न मैं बोल सकता
था न भगवान को जानता था और न उनकी शरण ग्रहण
करने योगयथा। परंतु फिर भी मेरी माता के शरणागत होने
पर भगवान ने मेरी रक्षा के लिए दौडकर आ गए। मुझे उन्हीं
प्रभु का चरित्र मैं श्रवण करना चाहता हूं। यह सुनकर
परीक्षित ने कहा जब कोई भगवान के चरित्र के संबंध में
प्रश्न करता है तब प्रश्रकर्ता, उ ारदाता और श्रोता तीनों ही
पवित्र हो जाते हैं। जगत की, भोग की, राजा की, भ्रष्ट लोगों
की, स्त्री की, पुरूष की, धन की, नास्तिक की चर्चा करते-
करते हमारी जीभ, हमारे कान और ह्दय अत्यन्त कलुषित
हो गए हैं। देवकी की विदाई के समय कंस अपनी चचेरी
बहन देवकी और वसुदेव को प्रसन्न करने के लिए उनके
रथ की बागडोर संभाले था। उसी समय देवताओं ने मन
में यह विचार किया कि यदि कंस देवकी-वसुदेव का इतना
भक्त हो जाएगा तो इनके पुत्ररूप में प्रकट होकर भगवान
इसको कैसे मारेंगे। इतने में आकाशवाणी हो गई कि अरे
कंस तू किससे प्रेम कर रहा है इसी देवकी के आठवे गर्भ
से तेरी मौत होने वाली है। आकाशवाणी सुनते ही कंसने
देवकी की चोटी पकडऱ उसको सडक पर पटक दिया हाथ
में तलवार लेकर मारने तैयार हो गया। इसीलिए संत तुलसी
दास ने कहा है - खल की प्रीति यथा थिर नाहीं। जिसके
ह्दय में जो भाव होता है वह स्वार्थ का बाधा पड़ते ही
प्रकट हो जाता है और अपना काम कर दिखाता है यही
स्वार्थी मनुष्य की पहचान है। कंस की क्रूरता देखो कि
उसने एक-एक करके देवकी के छ: बच्चे मार दिए।
आध्यात्मिक दृष्टि से वे छहों बच्चे षड्विकार थे।
षड्विकारों का शमन हो जाने पर ही आत्मा का साक्षात्कार
होता है। तब सातवें गर्भ में बलरामजी आए। भगवान ने
अपनी योगमाया से इनको उठाकर रोहिणी के पेट में रखवा
दिया उसके वे स्वयं देवकी के गर्भ में प्रवेश कर गए। और
फिर भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। इसके साथ ही
नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की के जयघोष के
साथ ही सारा कथास्थल गुंजायमान हो उठा। बाजे गाजे के
साथ पालकी में बसुदेव के द्वारा बालकृष्ण की पूजा, बधाई
गायन एवं नृत्य होने लगे। बैंड बाजों और पटाखों के बीच
सारा मेला कथा स्थल पर उमड़ पड़ा।