05 January, 2012

हिन्दुत्व को बदनाम करने का कांग्रेस का तीसरा अध्याय शुरू----------

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. गठबन्धन सरकार संत, मंदिर और संघ को बदनाम करने पर तुली हुई है। एक साजिश के तहत योजनाबध्द ढंग से वह इस कार्य में संलग्न है। दिग्विजय सिंह को इन देश विरोधी कारनामों के अघोषित प्रवक्ता भी बन गये हैं। दिग्विजय ंसिंह उस पर बयान जारी कर कांग्रेस प्रमुख की रजामंदी की मुहर लगा देते हैं। निश्चित ही देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।
जैसे अंग्रेजों के जमाने में अंग्रेज भारतीय सैनिकों द्वारा भारतीयों पर अत्याचार करवाते थे ठीक उसी तर्ज पर सोनिया गाँधी दिग्विजय सिंह से कार्य करवा रही हैं। राष्ट्र एवं हिन्दुव को बल प्रदान करने वाले इन तीनों शक्ति केन्द्राें पर सरकार का हमला निरंतर जारी है। सरकार इन तीनों को अपने कार्य में बाधा मानती है और ये तीनों उसके मार्ग मेंं बाधक हैं भी, क्योंकि संघ पूरे देश में अराष्ट्रीय गतिविधियों पर जनजागरण द्वारा रोक लगाता है, संत देश के कोने-कोने में घूम-घूम कर प्रवचन द्वारा लोगों को सदविचारों से अवगत कराते हैं जिससे ईसाई मिशनरियों को धर्म परिवर्तन कराने में काफी दिक्ततों का सामना करना पड़ता है और यह सब काम हिन्दुओं के श्रध्दा केन्द्र मंदिरों के कारण उसमें सफल नहीं हो पाते हैं।
संत, मंदिर और संघ ये तीनों राष्ट्र की प्राण शक्ति हैं। ये राष्ट्र की प्रेरणा, श्रध्दा एवं सुरक्षा के केन्द्र हैं। इन पर कुठाराघात देश पर कुठाराघात है। इसलिए कांग्रेस की कुटिल नीतियों को पहचानना होगा और इनका प्रत्युत्तर के लिए सम्पूर्ण देशवासी को खड़ा होना होगा। इन सारी समस्याओं की जड़ एण्टोनिया माइनो उर्फ सोनिया गांधी ही हैं। वह पोप की एजेंंट की तरह कार्य कर रही हैं। सरकार की संपूर्ण क्रिया कलाप स्वयं कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ही संचालित करती हैं। मनमोहन सिंह तो नाम मात्र के प्रधानमंत्री हैं। वास्तव में भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब कोई प्रधानमंत्री अपनी शक्तियों का प्रयोग किसी दूसरे के इशारे पर करता हो। कांग्रेस संताें और संघ के खिलाफ जोरदार अभियान चला चुकी है। इसलिए अब उसके निशाने पर देश के प्रमुख मंदिर और ट्रस्ट हैं। देश के प्रसिध्द मंदिरों का खजाना जो कि अंग्रेज भी नहीं जान सके थे उन मंदिरों की जासूसी करा कर उसकी गोपनीयता, पवित्रता को भंग कर उसकी धनराशि को हड़पने का प्रयास किया जा रहा है। जो काम अंग्रेज और मुगल नहीं कर पाये उसको करने में सोनिया गांधी सफल हो रही हैं।
कई दशकों से बंद मंदिरों के कपाट खुलाकर वहां उपलब्ध सामग्री का आकलन कर मंदिर की संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास कर लोगों की श्रध्दा भंग करने का प्रयास किया जा रहा है। ये लोग ऐसा कर मंदिरों से लोगों को दूर करना चाहते हैं ताकि वह इन से प्रेरणा न पा सके और धीरे-धीरे हिन्दू अपनी संस्कृति से दूर होते जायें। यह है कांग्रेसी चाल। सरकार जहां एक ओर हिन्दू मंदिराें एवं ट्रस्टों को अपने अधीन करने में लगी है वही दूसरी ओर मस्जिद एवं मदरसों को भरकम धनराशि अनुदान के रूप में मुहैया कराई जा रही है। यह कांग्रेस का दोहरा मापदण्ड क्या दर्शाता है। देश के मस्जिद एवं मदरसों के लिए विदेशों से काफी पैसा आता है लेकिन सरकार को इसका पता भी नहीं चल पाता है।
यह हिन्दुओं की उदारता, सहिष्णुता एवं शहनशीलता का ही परिणाम है कि सरकार एक के बाद एक देश एवं हिन्दुत्व विरोधी कार्य करने में लगी है। लेकिन हिन्दू चुप बैठा है। देश के जितने प्रसिध्द मंदिर है, सब उसके निशाने पर हैं। जो काम मुगल सैनिक बंदूक की नोक पर करते थे वही काम आज सोनिया गांधी अपनी सरकार के सहारे करवा रही हैं। संतों पर सरकार का हमला जारी है। जगद्गुरू शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती, आशाराम बापू, श्री श्री रविशंकर प्रसाद , अमृतानन्दमयी माँ, कृपालु जी महराज को लांक्षित करने की साजिश रची गई बाद में सरकार की कलई खुल कर सामने आयी, स्वर्गीय लक्ष्मणानन्द सरस्वती सहित कई संतों को मरवाने के बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और स्वामी असीमानन्द को जबरन जुर्म कबूल करवाने वाली सरकार और उसके बाद 4 जून को दिल्ली की काली रात केवल भारतीयों को ही नहीं अपितु विश्व के लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
सरकार एक जनहित याचिका का बहाना लेकर केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर के खजाने का निरीक्षण करा रही है उसमें भी वह विदेशियों की मद्द ले रही है। आखिर प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत में उस स्तर के लोग नहीं है जो उसका मूल्य आंकने के लिए विदेशी लोगों की आवश्यकता पड़ी। सरकार मन्दिर के खजाने को हड़पने के चक्कर मे है। जबकि वह मन्दिर त्रावणकोर के राज परिवार का है। उसका वाकायदा ट्रस्ट बना है। ट्रस्ट सरकार को कर भी देता है। उसके तहखाने में सदियों पुराने अस्त्र-शस्त्र, राज दण्ड, धर्म दण्ड, सोने के आभूषण, सोने चांदी के सिक्के, रत्न जड़ित मुकुट, बेशकीमती मूर्तियां तथा शाही परिवार के आभूषण मिले हैं जो मंदिर के खजाने के अंश हैं। जिसको अंग्रेजों से बचाने के लिए तत्कालीन राज परिवारों ने मन्दिर के हवाले कर दियें थे। स्थानीय लोंगो का मानना है कि मन्दिर की सम्पत्ति राज परिवार की है तथा केंन्द्र एवं राज्य सरकार नही ले सकती।
देश के कई मंदिरों के उदाहरण सामने आये है कि मंदिर की संपत्ति को सरकार ने अपने कब्जे में लेकर जमकर दुरूपयोग किया है तथा मंदिर बदहाली के शिकार हुए हैं। यह खजाना राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है लिहाजा इसको सुरक्षित एवं संरक्षित रखने की जरूरत है। देश के किसी भी मस्जिद या चर्च को न तो सरकारी अधिग्रहण में लिया गया है और न ही उसकी आय व्यय एवं सम्पत्ति की जांच हुई है। मन्दिरों की धनराशि और चढ़ावें को सरकार अल्पसंख्यकों के कल्याण में लगाती है लेकिन अल्पसंख्यक अपने मस्जिद और चर्च का पैसा धर्मान्तरण में लगातें है। इसके लिए ठोस रणनीति बनाने की आवश्यकता है कि मन्दिरों की धनराशि हिन्दुओं के कल्याण तथा उत्थान में खर्च की जाय। हमारे देश के अधिकांश मन्दिर और प्रमुख संत जनकल्याण हेतु अनेक कार्यक्रम चलाते हैं लेकिन सरकार को वह सब दिखाई नहीं पड़ता है। इसके लिए हमें आशाराम बापू द्वारा दिये गये नारे ‘मैडम भारत छोड़ो’ को बुलंद करना होगा तभी देश का कल्याण है, क्योंकि वह विदेशियों की हस्तक है। उनकी सारी नीतियां विदेश परस्त हैं।